क्या आर्य सच मे विदेशी है क्या कहता है इतिहास कौन है ये लोग1
क्या आर्य सच मे विदेशी है ? क्या कहता है इतिहास

क्या आर्य सच मे विदेशी है ? क्या कहता है इतिहास

क्या आर्य सच मे विदेशी है ? क्या कहता है इतिहास

आर्य विदेशी : क्या आर्य विदेशी है ? क्या कहता है इतिहास, पहली यह की भारतीय इतिहास की शुरुआत सिंधु घाटी की सभ्यता से होती है। … आर्यन इन्वेजन थ्योरी : भारत की सरकारी किताबों में आर्यों के आगमन को ‘आर्यन इन्वेजन थ्योरी’ कहा जाता है। इन किताबों में आर्यों को घुमंतू या कबीलाई बताया जाता है। यह ऐसे खानाबदोश लोग थे जिनके पास वेद थे, रथ थे, खुद की भाषा थी और उस भाषा की लिपि भी थी।

एडोल्फ़ हिटलर और मानव जाति के इतिहास का अध्ययन करने वाले यूरोप के कई लोग 19वीं सदी में यह मानते थे कि आर्य ही वह मुख्य नस्ल थी जिसने यूरोप को जीता. लेकिन एडोल्फ़ हिटलर का मानना था कि आर्य नॉर्डिक थे यानी वे उत्तरी यूरोप से निकले थे

जब भी जानकार लोग आर्य शब्द इस्तेमाल करते हैं, इसका मतलब उन लोगों से होता है जो इंडो-यूरोपियन भाषाएं बोलते थे और ख़ुद को आर्य कहते थे. ऐसे में मैंने भी इस लेख में ‘आर्य’ को इसी संदर्भ में इस्तेमाल किया है. यह किसी नस्ल के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया है, जैसे कि हिटलर ने इसे इस्तेमाल किया या फिर कुछ हिंदू दक्षिणपंथी इसे इस्तेमाल करते हैं.

द्रविड़ों पर आर्यों ने उत्तर से आ कर हमला किया

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कहते हैं कि मैक्स मूलर, विलियम हंटर और लॉर्ड टॉमस बैबिंग्टन मैकॉले इन तीन लोगों के कारण भारत के इतिहास का विकृतिकरण हुआ। अंग्रेंजों द्वारा लिखित इतिहास में चार बातें प्रचारित की जाती है। पहली यह की भारतीय इतिहास की शुरुआत सिंधु घाटी की सभ्यता से होती है। दूसरी यह की सिंधु घाटी के लोग द्रविड़ थे अर्थात वे आर्य नहीं थे। तीसरी यह कि आर्यो ने बाहर से आकर सिंधु सभ्यता को नष्ट करके अपना राज्य स्थापित किया था।

चौथी यह कि आर्यों और दस्तुओं के निरंतर झगड़े चलते रहते थे। द्रविड़ों पर आर्यों ने उत्तर से आ कर हमला किया, उस जमाने में मध्‍य एशिया में बेशुमार आर्य रहते होंगे। मगर वहाँ सब का गुजारा न हो सकता था इसलिए वे दूसरे मुल्कों में फैल गए। बहुत-से ईरान चले गए और बहुत-से यूनान तक और उससे भी बहुत पश्चिम तक निकल गए। हिंदुस्तान में भी उनके दल के दल कश्मीर के पहाड़ों को पार करके आए।

क्या आर्य सच मे विदेशी है ? क्या कहता है इतिहास

आर्य एक मजबूत लड़नेवाली जाति थी और उसने द्रविड़ों को भगा दिया।”- पंडित जवाहरलाल नेहरू, पिता का पत्र, पुत्री के नाम से! महापंडित बाल गंगाधर तिलक और केशव चंद्र सेन अकेले विद्वान नहीं थे, जो विदेशी आर्य के सिद्धांत को मानते थे।अंग्रेजों से नस्लीय रिश्ता दिखाने के लिए इस सिद्धांत को लाया गया। आज़ादी के बाद ये सिद्धांत उनके किसी काम का नहीं रहा तो वे देसी बन गए।

(यह पोस्ट का कुछ अंश दिलिप सी मण्डल कि पोस्ट से लिया गया है) https://www.facebook.com/dilipc.mandal/posts/4351267071633917

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Mahender Kumar
Author: Mahender Kumar

Journalist

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