पेरियार की सच्ची रामायण और ललई सिंह यादव का संघर्ष 1967
पेरियार ईवी रामासामी नायकर की सच्ची रामायण और ललई सिंह यादव का संघर्ष 

पेरियार ईवी रामासामी नायकर की सच्ची रामायण और ललई सिंह यादव का संघर्ष 

सच्ची रामायण और ललई सिंह यादव का संघर्ष

पेरियार ईवी रामासामी नायकर की सच्ची रामायण और ललई सिंह यादव का संघर्ष  महानायक पेरियार ललई सिंह यादव जो एक बहुजन महान नायक हैं 1 सितंबर उनका पेरियार स्वामी की सच्ची रामायण का हिंदी में पहली बार  प्रकाशित करने वाला द्रविड़ आंदोलन के अग्रणी क्रांतिकारी टीवी पेरियार रामास्वामी नायक कि जो किताब सच्ची रामायण को पहली बार हिंदी भाषा में रूपांतरित करने का श्री श्रेया बहुजन नायक ललई सिंह यादव को जाता है

पेरियार रामास्वामी की सच्ची रामायण का जब वह हिंदी में रूपांतरण किए अर्थात अनुवाद किए उस समय उत्तर भारत में जैसे लगा कि एक बड़ा तूफान उठ खड़ा हुआ था ललई सिंह यादव ने 1967 में द रामायण और ट्रू ब्रीडिंग का हिंदी अनुवाद करके और उसका टाइटल सच्ची रामायण नाम से प्रकाशित किया मनुवादी ब्राह्मणवादी लोगों ने आम हिंदुओं को उकसाया भड़काया विरोध में बहुत बड़ा हंगामा खड़ा कर दिया और ब्राह्मणवाद मनुवाद के दबाव में आकर राज्य सरकार ने प्रतिबंध एवं जब्ती का मांग करने लगे

सच्ची रामायण जैसे छपा है तो सच्ची रामायण में धूम मचा दिया कि हिंदू धर्म मनुवादी ब्राह्मणवादी लोगों ने सड़कों पर उतर आए और तत्कालीन उत्तर प्रदेश राज्य सरकार ने तथाकथित मनुवादी ब्राह्मणवादी लोगों के दबाव में आकर 8 दिसंबर 1969 को धार्मिक भावनाओं को भड़काने  का आरोप लगाते हुए सच्ची रामायण नामक किताब को जप्त कर लिया उसके बाद यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में पहुंच गया उत्तर प्रदेश राज्य सरकार के वकील ने न्यायालय में कहा कि राज्य के बहुसंख्यक हिंदू भावनाओं  पर प्रहार कर रहा है

और  क्योंकि इस पुस्तक में पुस्तक के लेखक अपने बहुत ही खुले तौर पर और खुली भाषा में  राम और सीता और जनकजैसे देवी चरित्र  को कलंकित करने का बात लिखा है और जिनकी हिंदू पूजा करते हैं अतः इस किताब पर यह जरूरी है कि प्रतिबंध लगाया जाए 

इलाहाबाद हाईकोर्ट में सच्ची रामायण और ललई सिंह यादव का विजय 

सच्ची रामायण | Sachchi Ramayan | पेरियार रामास्वामी नायकर | Periyara  Ramaswami

इलाहाबाद हाईकोर्ट में सच्ची रामायण और ललई सिंह यादव का विजय 

बहुजन नायक ललई सिंह यादव के वकील बनवारी लाल यादव ने पेरियार स्वामी की सच्ची रामायण के पक्ष में बहुत ही जबरदस्त पैरवी की जनवरी 19 वर्ष 1971 को  न्यायालय ने जप्त का आदेश निरस्त करते हुए सरकार को निर्देश दिया कि वह जप्त  किया हुआ सच्ची रामायण पुस्तक को वापस करते और  लालई ही सिंह यादव  को 300 रुपए जो मुकदमे में खर्च लगा है ललई सिंह यादव को दे

ललई सिंह यादव की हाईकोर्ट में जीत 

सर्वोच्च न्यायालय में सच्ची रामायण और ललई सिंह यादव का विजय  का जीत

सर्वोच्च न्यायालय में बहुजन नायक ललई सिंह यादव और सच्ची रामायण का विजय  का जीत

उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील किया सुनवाई तीन जजों की पीठ ने की जिसका अध्यक्ष न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर किया इसके दो और अन्य न्यायधीश थे पी एन भागवती एवं सैयद मुर्तजा फजल अली सर्वोच्च न्यायालय में उत्तर प्रदेश बना बहुजन नायक ललई सिंह यादव के नाम से मुकदमा चला इस मामले पर 16 सितंबर 1976 को फैसला आया जिसमें सर्वोच्च न्यायालय का फैसला सच्ची रामायण पुस्तक के प्रकाशक के पक्ष में रहा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जजमेंट  का फैसले को सर्वोच्च न्यायालय ने सत्यम आना और उत्तर प्रदेश राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया

ललई सिंह यादव का हिंदू धर्म से बौद्ध धर्म में प्रवेश

Sachchi Ramayan Periyar E V Ramasamy Ravan Lagu MP3 - MP3 Dragon

ललई सिंह यादव का हिंदू धर्म से बौद्ध धर्म में प्रवेश

इलाहाबाद उच्चतम न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में सच्ची रामायण के हित में पक्ष में मुकदमा जीतने के बाद ललई सिंह यादव दलित पिछड़ों का नायक बन बैठे ललई सिंह यादव ने 1967 में अपना हिंदू धर्म त्याग दिया और बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद वह अपने नाम से यादव सरनेम हटा दिया उनका सरनेम यादव हटाने के पीछेउनका मकसद था यह बताना कि वह जाति विरोध में उनकी चेतना गहराई से काम कर रही थी वह ऐसे समाज का निर्माण कर रहे थे जिसमें जाति का नामोनिशान ना हो

अशोक पुस्तकालय का प्रारंभ 

पेरियार ललई सिंह यादव ने इतिहास में और इतिहास के बहु जनों के  नायक का खोज किया बौद्ध धर्म के अनुयाई बहुजन नायक सम्राट अशोक को वह अपना आदर्श व्यक्तित्व में शामिल कर लिए थे उन्होंने सम्राट अशोक के नाम से अशोक पुस्तकालय नाम से प्रकाशन संस्था कायम की और अपना एक प्रिंटिंग प्रेस भी लगवाया और उसका नाम उन्होंने सस्ता प्रवेश रखा 

नाटकों-किताबों का लेखन 

नाटकों-किताबों का लेखन 

ललई सिंह यादव ने पांच नाटक लिखे पायला अंगुलिमाल का नाटक दूसरा शंबूक ऋषि का वध तीसरा संत माया बलिदान चौथा धनुर्धारी एकलव्य और  पांचवा नाग यज्ञ  और ललई सिंह यादव ने गद्य किताबें भी लिखें जिसमें पहला शोषित पर धार्मिक डकैती दूसरा 100 सीटों पर राजनीतिक डकैती तीसरा सामाजिक विषमता कैसे समाप्त हो ललई सिंह यादव के नाटकों और साहित्य में योगदान के बारे में कंवल भारती लिखते हैं

की यह साहित्य हिंदी साहित्य के समांतर नया वैचारिक क्रांति हां जिसने हिंदू ब्राह्मणवाद मनुवाद नायखू और हिंदू संस्कृति पर दलित वर्गों की सोच बदल कर रख दिया था यह नया विवाद था जिसका हिंदी साहित्य में बहुत आभार था ललई सिंह यादव के इस क्रांतिकारी साहित्य ने बहुत जनों में ब्राह्मणवाद मनुवाद के खिलाफ विद्रोह का चेतना पैदा कर दिया और उनमें श्रमण संस्कृति और वैचारिक का नया जागरण किया 

उत्तर भारत के पेरियार ललई सिंह यादव कहलाए

उत्तरकाण्ड: ब्राह्मण बालक की मृत्यु, शंबूक ऋषि की हत्या किसने की, शंबुक  कथा, शंबूक ऋषि का वध, राम ने क्यों की शंबूक की हत्या (Sampoorna Ramayan  Uttar Kand ...

ललई सिंह यादव उर्फ पेरियार ललई सिंह उनको पेरियार की उपाधिपेरियार की जन्मस्थली  एवं कर्मस्थली प्रांत तमिलनाडु में मिला था बाद में जब वह हिंदी पट्टी उत्तर भारत के पेरियार के रूप में बहुत प्रसिद्ध हुए बहुजन के नायक पेरियार ललई सिंह का जन्म 1 सितंबर 1921 को कानपुर में रेलवे स्टेशन झिझक के नजदीक 18 गांव में हुआ था अन्य बहुजन नायकों की तरह बहुत संघर्षशील था

पहले वह 1933 में ग्वालियर के सशस्त्र पुलिस बल में बात और सिपाही भर्ती हुए थे पर जब कांग्रेस के स्वराज का समर्थन करने के कारण जो ब्रिटिश इंडिया हुकूमत में गुनाह था उनको 2 साल बाद बर्खास्त कर दिया गया और उन्होंने अपील किया और अपील द्वारा व फिर से बहाल कर दिए गए 1946 में उनको ग्वालियर में ही Non-gazetted मुलाजी मान पुलिस एंड आर्मी संघ की स्थापना की और उसके सर्वसम्मति से अध्यक्ष बने

उनके इस संगठन के द्वारा पुलिस कर्मियों की समस्याओं को उठाया गया और उनके लिए उच्च अधिकारियों से उन्होंने लड़ा जब अमेरिका में भारतीयों ने लाला हरदयाल के नेतृत्व में गदर पार्टी बनाई तब भारतीय सेना के जवानों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने के लिए सोल्जर आफ दीवार पुस्तक लिखी गई थी

तब ललई सिंह यादव ने उसी की तर्ज पर 1946 में सिपाही की तबाही नाम का किताब लिखा वार्तालाप शैली में लिखा हुआ किताब था यदि वह प्रकाशित हुई होती तो उसकी तुलना आज महात्मा ज्योतिबा फुले की किसान का कोड़ा नामक पुस्तक और अछूतों की कैफियत किताबों से जरूर की जाती जगन्नाथ आदित्य ने अपनी पुस्तक में सिपाही की तबाही से कुछ अंशों को कोट किया था जिनमें सिपाही और उसकी पत्नी की बीच घर बदहाली पर संवाद होता है अंत में लिखा जाता है

वास्तव में  पास्टर म***** मौलवी पुजारी पुरोहित की अनदेखी कल्पना स्वर्ग और नर्क नाम की बात बिल्कुल झूठ है यह है आंखों देखी हुई सब  पर बीती हुई सच्ची नरक की व्यवस्था सिपाही के घर की इस नरक की व्यवस्था का कारण है सिंधिया गवर्नमेंट की इंतजाम ई अतः इसे प्रत्येक दशा में पलटना है समाप्त करना है जनता पर जनता का शासन हो तब अपना सब मांगे मंजूर होंगे 

ब्रिटिश इंडिया हुकूमत में 5 साल की जेल की सजा ललई सिंह यादव

तब 1 साल बाद ललई सिंह यादव ने ग्वालियर पुलिस और आर्मी में हड़ताल करवा दी जिसके कारण बस 29 मार्च 1947 को पुणे गिरफ्तार कर लिया जाता है और मुकदमा चलाया जाता है और उनको 5 वर्ष की सश्रम जेल की सजा सुनाई जाती है और 9 महीने जेल में रहने के बाद जब भारत आजाद हो जाता है तब ग्वालियर प्रांत के भारत गणराज्य में विलय होने के बाद तब वह 12 जनवरी 1948 को जेल से रिहा कर दिए जाते हैं

1950 में सरकारी सेवा  से मुक्त होने के बाद वह अपनी पूरी तरह बहुजन समाज की मुक्ति के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं तब उन्हें इस बात का गहराई से अंदाजा हो चुका था कि ब्राह्मणवाद के मिटने के  बिना भजनों की मुक्ति नहीं हो सकती है सामाजिक कार्यकर्ता और एक विद्वान लेखक और प्रकाशक के रूप में उन्होंने अपना पूरा जीवन मानववाद ब्राह्मणवाद को मिटाने और बहू जनों को मुक्ति दिलाने के लिए समर्पित कर दिया था 7 फरवरी 1993 को उन्होंने इस दुनिया से अपना अंतिम प्रस्थान किया विदाई लिया ऐसे महान नायक बहुत कम धरती पर होते हैं के महान कार्यों के  स्मरण में एक छोटा सा लेख उम्मीद है आप को पढ़कर अच्छा लगेगा

Mahender Kumar
Author: Mahender Kumar

Journalist

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