विकास का पूंजीवादी मॉडल
विकास का पूंजीवादी मॉडल

विकास का पूंजीवादी मॉडल

विकास का पूंजीवादी मॉडल

भारत में आर्थिक विकास का जो गुजरात माडल का अहर्निश शोर शराबा है, यह वास्तव में न तो गुजरात माडल है और न ही अंबानी और अडानी जैसे पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों के हित में संघी योजना का भाग है. यह दुनिया के तेरह सबसे बड़े पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों के मालिकों के दिमाग की उपज है, जिसे विश्व पूंजीवाद की रक्षा के लिए प्रस्तावित “नई विश्व व्यवस्था” के लिए वैश्विक स्तर पर स्वीकार किया गया है. इसकी शुरुआत सोवियत संघ के विघटन के साथ ही हुई, जब पूंजीवादी व्यवस्था के समर्थक बुद्धिजीवियों ने “इतिहास का अंत”, “विचारधाराओं का अंत” और “सभ्यताओं का संघर्ष” के सिद्धांत का प्रतिपादन किया और जिसे दुनिया भर में पूंजीपतियों के समाचारपत्रों और मिडिया द्वारा प्रचारित और प्रसारित करने के साथ ही प्रतिष्ठापित भी किया गया. इन्हीं प्रतिपादित सिद्धांतों को अमलीजामा पहनाने के लिए उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के राजनीतिक हथियार तैयार किए गए, और इन हथियारों को डंकल ड्राफ्ट के माध्यम से विश्व व्यापार संगठन ने दुनिया भर में पूंजीवादी विकास के माडल के रूप में स्वीकृति प्रदान कराने के लिए विकासशील और अविकसित देशों पर आर्थिक, राजनीतिक , सामरिक और राजनयिक दबाव बनाया गया, और जिसे इन देशों ने इच्छा या अनिच्छापूर्वक आज स्वीकार कर चुके हैं. इसी माडल का प्रयोग भारत में मोदी के मुख्यमंत्री रहते गुजरात में लागू किया गया, जिसके माध्यम से धर्म, राष्ट्र और सांप्रदायिकता की आड़ में अंबानी और अडानी को गुजरात के आर्थिक संसाधनों को खुलकर लूटने की छूट मिली, और इसे ही भारत में गुजरात माडल के तौर पर पेश किया गया.

नई विश्व व्यवस्था के मद्देनजर आर्थिक विकास का यह माडल निर्णय निर्माण की अंतिम शक्ति राजनीतिक प्रतिष्ठानों के बदले आर्थिक दैत्यों के हाथों में केन्द्रित कर देता है, जिसके अनुसार अर्थसत्ता को असीम और अपरिमेय शक्ति का स्रोत मान लिया जाता है, और बाकी के राजसत्ता, धर्मसत्ता और सांस्कृतिक मंचों की सहभागिता सहायक के रूप में होती है . विश्व व्यवस्था का वास्तविक संचालिका शक्ति जी सेवेन और जी ट्वेंटी के पूंजीपति और कारपोरेट घरानों के मालिक होते हैं. पूरी दुनिया की राजव्यवस्था का संचालन तेरह सबसे धनी पूंजीपतियों के निर्णायक मंडल द्वारा होता है, जिसने विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र और उनके विभिन्न अंगों को भी नियंत्रित करता है. दुनिया के राज्याध्यक्ष इन्हीं पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के तौर पर काम करते हैं. विश्व बैंक और अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष के कर्ज तले दबे दुनिया के अधिकांश देशों के लिए इनका निर्णय मानने के अलावा और कोई भी विकल्प शेष नहीं है. हथियारों की बिक्री और युद्ध का निर्णय भी पूंजीपतियों के इसी शीर्ष गिरोह द्वारा होता है. यही गिरोह विश्व व्यापार की नियामक शक्ति भी हैं, और इनका ही निर्णय मानने और उन्हें लागू करने के लिए राजनीतिक शक्ति बाध्य है.

भारत में अंबानी और अडानी के हाथों में इतनी शक्ति का केन्द्रीकरण भी इसी नई विश्व व्यवस्था के निर्माण के लिए बनी वैश्विक योजना का अंग है, जिसके अनुसार हर देश में पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों का एक छोटा मगर सबसे प्रभावशाली गुट के हाथों में ही राजनीतिक सत्ता की संचालन शक्ति होती है, जो वैश्विक पूंजीवाद के हितों के अनुरूप राजनीति सत्ता को निर्देशित करता है. आज भारत में जो आर्थिक और राजनीतिक स्थिति है, उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जनता और विरोधी दलों की प्रतिरोधक शक्ति को इस कदर शक्तिहीन और पंगु बना दिया गया है कि वे चाहकर भी कोई निर्णायक प्रभाव डालने में असमर्थ हैं. लगातार झूठे वादे, झूठे वक्तव्य, झूठे सपने और लोकलुभावन योजनाओं के माध्यम से जनता के एक बड़े वर्ग को धर्म और राष्ट्र की अलौकिक चासनी में डूबो दिया गया है, और जनता उस चासनी में डूबते- उतराते हुए अलौकिक अध्यात्मिक आनंद में डूबी हुई है, और सरकार पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों के हाथों में राष्ट्र की सारी संपत्ति, संपदा और प्राकृतिक संसाधनों को सौंपती जा रही है. कहीं कोई प्रतिरोध नहीं, कोई रोक नहीं. अश्वमेध यज्ञ के घोड़े की तरह बेलगाम राजसत्ता जनशक्ति और जनसत्ता को हमेशा के लिए मिटा देने को आतुर है. धर्म, राष्ट्र और सांप्रदायिकता की राजनीति के धालमेल से पूरे देश में एक ऐसा माहौल बना दिया गया है कि सरकार को आलोचना से परे एक दैवी शक्ति के रूप में मान्यता मिल रही है. गुजरात दंगों का मुख्य अपराधी आज देश के शीर्ष राजनीतिक शक्ति का सर्वेसर्वा बन ईश्वर का अवतार माना जा रहा है. आमलोग उसे दैवी शक्ति से संपन्न एक अवतारी पुरुष मान रहे हैं, जो धरती पर अधर्म का नाश करने के लिए आया ईश्वर का दूत है. इसके असंख्य झूठे वकतव्यों, चालबाजियों और जनविरोधी नीतियों, निर्णयों और कार्य योजनाओं को ईश्वरीय योजना के रूप में स्वीकार किया जा रहा है. आलोचना करने, विरोध करने, जनसंघर्ष और जनांदोलन करने वालों को राष्ट्रद्रोही के रूप में प्रक्षेपित किया जा रहा है. उन्हें या तो मौत के घाट उतार दिया जा रहा है या फिर जेलों में सड़ने के लिए छोड़ दिया जा रहा है.

वैश्विक स्तर पर फासीवादी या सर्वसत्तावादी राजनीतिक सत्ता को स्थापित किया जा रहा है. राज्याध्यक्षों के हाथों में असीम शक्ति का केन्द्रीकरण होता जा रहा है. भारत, चीन, रूस, पोलैंड, हंगरी, अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अस्ट्रेलिया के राज्याध्यक्षों के हाथों में हाल फिलहाल के वर्षों में राजनीतिक शक्तियों का जिस तरह से केन्द्रीकरण हुआ है, वह आधुनिक इतिहास के अनोखी चीज है. चीन और रूस के राज्याध्यक्षों ने तो अपने आप को जीवन भर के लिए सर्वेसर्वा संवैधानिक रूप सु बनवा लिया है. इसके विपरीत, जनसत्ता और जनशक्ति को इस कदर शक्तिहीन और अपंग बना दिया गया है कि वह चाहकर भी सरकार के खिलाफ कोई भी प्रतिरोध नहीं कर सकती. विगत सौ सालों में मजदूर वर्ग को सरकारों से जितने भी संवैधानिक या कानूनी अधिकार प्राप्त हुए थे, सबको क्रमवार खत्म कर दिया गया है! नागरिक अधिकारों की मर्यादा और अस्मिता का लगातार अपहरण होता जा रहा है. जनवादी अधिकारों तथा प्रेस और अभिव्यक्ति के अधिकारों पर लगातार कुठाराघात होता जा रहा है और जनता और विरोधी दर टुकुर-टुकुर ताक रहे हैं. जन अधिकारों का दमन विकासशील और अविकसित देशों में ज्यादा बड़े पैमाने पर हो रहा है. विकास की आंधी में बहुसंख्यक मेहनतकश वर्ग के सारे अधिकार रूई के फाहे की तरह उड़ रहे हैं! उनके सारे संवैधानिक अधिकारों के साथ ही नौकरी की गारंटी, काम के घंटे का निर्धारण, मनोरंजन के अधिकार, हड़ताल, घेराव या तालाबंदी के अधिकार, मालिक के साथ सौदेबाजी का अधिकार सब कुछ समाप्त हो गया, और जनता चुपचाप इसे घटित होते हुए देखती रही. सरकारी दमनचक्र के खिलाफ कोई आवाज़ नहीं, कोई विरोध नहीं, और न ही कोई आंदोलन. राजसत्ता की निर्बाध शक्ति के आगे हर कोई नतमस्तक है. यही तो नई विश्व व्यवस्था की झांकी है, जहाँ समाज के निचले तबके को अधिकारविहीन और सबसे ऊपरी तबके को असीमित अधिकारों से लैस किया जा रहा है. खैर, विकसित देशों में तो फिर भी जनता को राहत है, क्योंकि वहाँ की जनता जिन अधिकारों और नागरिक सुविधाओं की अभ्यस्त है, उसमें किसी भी तरह की कटौती उन्हें मंजूर नहीं, और सरकारों को भी जनता की नाराजगी के खतरे का अनुमान है. जिन लोकतांत्रिक अधिकारों का वे विकसित देशों के नागरिक समाज के रूप में सदियों से उपभोग कर रहे हैं, उनको खत्म करना या उन्हें स्थगित करना अब संभव नहीं है. इसलिए विकासशील और अविकसित देशों के नागरिकों पर अधिकारों और सुविधाओं की कटौती की सबसे अधिक मार पड़ रही है.

दूसरी तरफ वैश्विक पूंजीवाद लगातार संकट से घिरता जा रहा है. सारे उपायों के बावजूद भी पूंजीवाद को वह मनोवांछित सफलता नहीं मिल रही है, जिसे उसे तलाश है. उत्पादन, मूल्य और बिक्री की कोई समुचित और कारगर नीति सफल होती दिखाई नहीं दे रही है. आम लोगों की क्रयशक्ति लगातार घटती जा रही है. ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि उसी अनुपात में बाजार में वस्तुओं की बिक्री का दर भी घटता जाएगा. औद्योगिक उत्पादन से ज्यादा अब बैठे- बैठे पूंजी से पूंजी कमाने या सरकारी बांड से पूंजी कमाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादन की बढ़ती भूमिका ने भी एक संकट पैदा कर दिया है और वह यह है कि लगातार नये-नये इन उपकरणों की खरीद करने की क्षमता बहुसंख्यक आबादी के पास तो है ही नहीं. बाजार में वस्तुओं की भरमार है, पर खरीददार उसी अनुपात में नहीं हैं. पूरी दुनिया में क्रिप्टो करेंसी या आवारा पूंजी की पकड़ बाजार पर बढ़ती जा रही है. ऐसे में उसका दायरा भी सीमित होता जा रहा है.

असीम मुनाफे की बढ़ती प्रवृत्ति, घटते मुनाफे, और जनकल्याणकारी योजनाओं की बढ़ती मांग ने पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों को इस बात को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया है कि अपनी गलत और अमानवीय नीतियों की जगह इसका दोष बढ़ती आबादी के सिर मढ़ दें. शीर्ष स्तर पर पूंजी का बढ़ता केन्द्रीकरण और निचले स्तर पर लोगों की घटती आमदनी और क्रयशक्ति के बीच आज विश्व पूंजीवाद डोल रहा है. कम से कम लोगों के हाथ में अधिक से अधिक पूंजी का संकेद्रण ही वह असल बीमारी का जड़ है, जिसे खत्म करना जरूरी है. पर, दुनिया के पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों के लिए यह संभव नहीं है. दुनिया की कुल पूंजी का सत्तर प्रतिशत दुनिया के सिर्फ तेरह पूंजीपतियों के पास जमा है! दुनिया की कुल संपत्ति पर बहुसंख्यक आबादी का अधिकार महज बीस प्रतिशत के करीब ही है. पूंजी का यह असमान वितरण ही वह मूल आर्थिक समस्या है, जिससे पूंजीवाद निबटने में अक्षम और असमर्थ है. इसलिए उसने दुनिया की बढ़ती आबादी को ही सारे संकट का जड़ मान लिया है, और इस बढ़ती आबादी का खात्मा या उसे पूरी तरह से नियंत्रित करना ही एकमात्र उपाय है. वास्तव में यह सच्चाई से आंख चुराने का प्रयास है. दुनिया में पूंजी का जितना निवेश बेकार और फिजुलखर्ची के लिए हो रहा है, वह अनुमान से परे है. हथियारों, फैशन की वस्तुओं, नशीले पदार्थों तथा वैश्यावृत्ति पर जितना खर्च पूरी दुनिया में हर साल होता है, उसका तो अनुमान भी नही लगाया जा सकता. मुनाफाखोरी की बढ़ती असीम प्रवृत्ति और हथियारों पर हो रहे बेतहाशे खर्च को रोककर दुनिया की वृहत्तर आबादी के लिए आवश्यक संसाधनों का मुहैया किया जा सकता था. पर, यह पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों के लिए संभव नहीं है. इसलिए वे दुनिया की आबादी को ही घटाने के लिए प्रतिबद्ध और एकजुट हुए हैं.

इसी उद्देश्य की अगली कड़ी के रूप में कोरोना की कहानी शुरू होती है, जिसने पूरी दुनिया की व्यवस्था को झकझोर दिया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, तेरह सबसे बड़े पूंजीपतियों का गिरोह और उनके तथाकथित सलाहकारों के खुराफाती दिमाग की ही यह षडयंत्रकारी उपज है कि दुनिया की आबादी को कम करने के लिए ऐसे उपायों की ही जरूरत है. कातिलों के इस गिरोह में दवा कंपनियों और विश्व स्वास्थ्य संगठन की भी पूरी और खुली सहभागिता है. इन विषम परिस्थितियों में पूंजीवाद का उदारवादी लोकतंत्र और जनकल्याणकारी राज्य का वह मुखौटा भी उतर गया है, जिसके माध्यम से वह दुनिया के लोगों को करीब डेढ़ सौ सालों से भरमाता रहा है. आज विश्व पूंजीवाद को अपना यह मुखौटा संभालना कठिन हो रहा है. अब उसे कोई झिझक नहीं है इस मुखौटे को उतार फेंकने में और आज की तारीख में उसने इस मुखौटे को दफन कर दिया है. उसका शैतानिक स्वरूप और दानवीय प्रवृतियाँ सबके सामने उजागर हो गई हैं. पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों को अपना मुनाफा चाहिए, चाहे इसके लिए दुनिया की आबादी को खत्म ही क्यों न करना पड़े. आज विश्व पूंजीवाद का ड्रैकुला अपने वास्तविक चेहरे के साथ हमारे सामने है, और दुनिया की बहुसंख्यक आबादी की जिंदगी खतरे में है. चाहे युद्ध हो, चाहे बीमारी हो, चाहे कोरोना हो या फिर जहरीली नशीली दवाओं का प्रयोग हो, दुनिया की वृहत्तर आबादी को खत्म करना ही है. यह आबादी युद्ध से मरे, भूख से मरे, रोग से मरे या फिर गोली से, इसे हर हाल में मरना ही होगा. नई विश्व व्यवस्था के लिए यह एकमात्र शर्त और आवश्यकता है.

राम अयोध्या सिंह
© Ram Ayodhya Singh
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B kumar Arihant
Author: B kumar Arihant

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