क्या नफरत के सौदागरों ने हिंदुस्तानी समाज की जड़े खोखला कर दी 2021
क्या नफरत के सौदागरों ने हिंदुस्तानी समाज की जड़े खोखला कर दी ?

क्या नफरत के सौदागरों ने हिंदुस्तानी समाज की जड़े खोखला कर दी ?

क्या नफरत के सौदागरों ने हिंदुस्तानी समाज की जेड खोखला कर दी ? अभी कोरोनावायरस के दौर में हमने बहुत ही दुखद घटनाएं देखने को और सुनने को मिली है | जो हमारे दिल को छू और दिल दहलाने पर मजबूर कर देती है | पिछले दिनों में हमारे सामने ऐसे ही कुछ दिल दहला देने वाली दुखद घटना सामने उभर कर आई है | करोना महामारी के समय में जहां सब लोग डर कर दहशत में बिना किसी को छुए अपने घरों में बैठे हुए हैं इसी के बीच हमारे सामने एक खबर उभर कर आई है |

क्या नफरत के सौदागरों ने हिंदुस्तानी समाज की जड़े खोखला कर दी ?
1- ईरतिज़ा कुरैशी

यह खबर दिल्ली के बुरारी शहर की है इस खबर में यह है| कि कैसे एक बेटा अपने माता पिता के अंतिम संस्कार के लिए संघर्ष करता हुआ दिख रहा है| इसमें पहली तस्वीर दिल्ली के एक युवा जिसका नाम ईरतिज़ा कुरैशी है |तथा दूसरी तस्वीर दिल्ली के बुराड़ी के लक्ष्मण तिवारी और उनके 4 साल के बेटे की है |बताई जा रही है | पिछले बीते कुछ दिनों में लक्ष्मण तिवारी के माता-पिता दोनों का ही कुछ घंटों के अंतराल में ही स्वर्गवास हो गया था लक्ष्मण तिवारी की मां का स्वर्गवास ऑक्सीजन ना मिलने के कारण हुआ था|

क्या नफरत के सौदागरों ने हिंदुस्तानी समाज की जड़े खोखला कर दी ?
लक्ष्मण तिवारी और उनका 4 साल का बेटा

उसके बावजूद उन्होंने पूरे 1 घंटे तक मौत से लड़ती रहे ऑक्सीजन ना मिलने के कारण उन्हें तेज से घबराहट होने लगी| लक्ष्मण तिवारी से यह ना देखा गया और वह अपनी मां को पंपिंग करने लगे लेकिन उनकी मां ने दम तोड़ दिया |और इस घटना के कुछ घंटे बाद ही लक्ष्मण तिवारी और उनका 4 साल का बेटा इस घटना से बहुत दुखी थे अपने आप को संभालते हुए वह अपने मां के अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे

लेकिन कुछ समय पश्चात लक्ष्मण तिवारी के पिता ऑक्सीजन नहीं ले पा रहे थे| लक्ष्मण तिवारी से ना देखा गया | और वह बिना देरी किए उन्हें हॉस्पिटल लेकर गए और ऑक्सीजन ना मिलने के कारण उनका स्वर्गवास हो गया|

नफरत के सौदागरों फ़िज़ाओं में भी नफरतजहर घोला है, लक्ष्मण ने हताश होकर रिश्तेदारों को फोन लगाया लेकिन कोई नहीं आया|

क्या नफरत के सौदागरों ने हिंदुस्तानी समाज की जड़े खोखला कर दी ?

मां-बाप की मौत लक्ष्मण और उसके 4 साल के मासूम बेटे के सामने हो गई लक्ष्मण पूरी तरह से इस दुविधा में पड़ गया | मां-बाप की जाने का शौक मनाऊं या उनका अंतिम संस्कार मनाएं ?|या अपने 4 साल के बच्चे को संभाले ? लक्ष्मण अकेला कुछ ना कर सकता था| इसलिए उसने अपने पड़ोसी से मदद मांगी |लेकिन कोई भी व्यक्ति उसे या उसके बच्चे को सहारा देने के लिए आगे नहीं आया |लक्ष्मण ने हताश होकर रिश्तेदारों को फोन लगाया लेकिन कोई नहीं आया|

15 घंटे तक मां-बाप का शव घर के अंदर ही पड़ा रहा| तथा यह खबर किसी तरह 35 साल के युवा ईरतिज़ा कुरैशी को मिली और वह इस दिशा मैं सुबह 4:00 बजे ही बुरारी थाने पहुंच जाते हैं |और वह तिवारी परिवार की मदद के लिए बहुत गुहार लगाते हैं |लेकिन कहीं से कोई मदद नहीं मिलती | पुलिस द्वारा भी यह कहा जाता है कि हमारे पास ऐसी कोई सुविधा नहीं है

जो आपकी सहायता कर पाए |आप 102 या 112 से संपर्क करें |उसने बिना किसी देरी के 102 नंबर पर कॉल किया तो उसे वहां से जवाब मिलता है| कि हमारे पास करोना वायरस मरीजों की लाशों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है |हमें केवल जीवित रोगियों के मामले को संभालने की जिम्मेदारी मिली है |

112 नंबर डायल करने पर उन्हें अजीबो गरीब चीजे बताई जाती है आप जस्टडायल के लिए प्रयास क्यों नहीं करते और नंबर क्यों नहीं लेते हैं ईरतिज़ा कुरैशी को कोई भी कहीं से मदद ना मिलने के कारण उसने सामाजिक संगठनों की मदद मांगनी शुरू की |बहुत मुश्किल से एक संगठन तैयार होता है| तो शर्त लगा देता है कि शव को श्मशान के बाहर छोड़ आएंगे ड्राइवर हाथ लगाएगा तो ₹8000 लेगा | लेकिन लक्ष्मण तिवारी की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी | कि वह खर्चा उठा सकता लक्ष्मण तिवारी के माता पिता का शव गर्मी के कारण गलता जा रहा था| इस दिशा मैं ईरतिज़ा कुरैशी पुलिस से गुहार करता है

बेब पोर्टल ने लाइव किया एक करोड़ लोगों ने देखा देखा लेकिन मदद को एक ही आया

और बोलता है| प्लीज इस परिवार की मदद कीजिए ` इस परिवार में एक 4 साल का बच्चा है| जिसके ऊपर दिमागी रूप से क्या असर पड़ेगा इसलिए प्लीज इस स्थिति को समझिए और कुछ कीजिए पुलिस मदद करने को फिर से इंकार कर देती है और वह उन्हें सलाह देती है |कि आप श्मशान घाट जा कर देखिए वहां कोई एंबुलेंस होगी |बिना किसी देरी के निगमबोध घाट जाते हैं | वह बुरी स्थिति थी वहां पर अंतिम संस्कार के लिए कई घंटो तक इंतजार करना पड़ता लेकिन इतना टाइम नहीं था |

उन्होंने हिंदुस्तान लाइव के फरहान याहिया से मदद मांगी और साथ ही DCP नॉर्थ दिल्ली को Tag किया बेब पोर्टल ने लाइव किया एक करोड़ लोगों ने देखा देखा लेकिन मदद को एक ही आया

उसका भी धर्म इस्लाम था करीब 22 घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद और इतना दुख उठाने के बाद लक्ष्मण के माता पिता का आशीर्वाद सम्मानजनक अंतिम संस्कार हुआ और उन्हें आखिरी विदाई देते हुए रोता हुआ अपने 4 साल के बेटे को गले लगाता है और उसका 4 साल का बेटा लगभग 24 घंटे अपने दादा दादी की क्षत-विक्षत लाश को देखता है और उसके पिता मदद की भीख मांगते हैं

इसके पश्चात भी एक भी व्यक्ति उनकी मदद के लिए आगे नहीं आता वैसे हिंदुस्तान अपने भाईचारे के लिए जाना जाता था जय यही वह समाज है जिसमें हम भाईचारा और एकता को देखते हैं क्या वह समाज ऐसा दिखता था हमारे आसपास ऐसे बहुत लोग हैं जो हम से मदद की भीख मांगते हैं.

लेकिन उनमें से बहुत कम लोग इस दिशा जैसे सामने उभर कर आते हैं 4 साल के बच्चे के लिए मिसाल बन कर आया था आज भी हमारे देश में धर्म के नाम पर भेदभाव किए जाते हैं लेकिन आगे भविष्य में जभी भी धर्मों को लेकर भेदभाव किया जाएगा तो लक्ष्मण तिवारी के 4 साल के बेटे उस विषय में जरूर अपनी टिप्पणी रखेगा और बताएगा कि धर्म से बड़ी इंसानियत होती है ईरतिज़ा कुरैशी है तथा दूसरी तस्वीर दिल्ली के बुराड़ी के लक्ष्मण तिवारी और उनके 4 साल के बेटे की है बताई जा रही है

पिछले बीते कुछ दिनों में लक्ष्मण तिवारी के माता-पिता दोनों का ही कुछ घंटों के अंतराल में ही स्वर्गवास हो गया था लक्ष्मण तिवारी की मां का स्वर्गवास ऑक्सीजन ना मिलने के कारण हुआ था

मां-बाप की मौत लक्ष्मण और उसके 4 साल के मासूम बेटे के सामने हो गई लक्ष्मण पूरी तरह से इस दुविधा में पड़ गया की मां-बाप की जाने का शौक उनका अंतिम संस्कार मनाएं या अपने 4 साल के बच्चे को संभाले

उसके बावजूद उन्होंने पूरे 1 घंटे तक मौत से लड़ती रही ऑक्सीजन ना मिलने के कारण उन्हें तेज से घबराहट होने लगी लक्ष्मण तिवारी से यह ना देखा गया और वह अपनी मां को पंपिंग करने लगे लेकिन उनकी मां मौत से और ना लड़ चुकी और दम तोड़ दिया और इस घटना के बाद लक्ष्मण तिवारी और उनका 4 साल का बेटा इस घटना से बहुत दुखी थे अपने आप को संभालते हुए वह अपने मां के अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे

लेकिन कुछ समय पश्चात लक्ष्मण तिवारी के पिता ऑक्सीजन के लिए तड़पते दिखे लक्ष्मण तिवारी से ना देखा गया और वह बिना देरी किए उन्हें हॉस्पिटल लेकर गए और ऑक्सीजन ना मिलने के कारण उनका स्वर्गवास हो गया

मां-बाप की मौत लक्ष्मण और उसके 4 साल के मासूम बेटे के सामने हो गई लक्ष्मण पूरी तरह से इस दुविधा में पड़ गया की मां-बाप की जाने का शौक उनका अंतिम संस्कार मनाएं या अपने 4 साल के बच्चे को संभाले लक्ष्मण अकेला कुछ ना कर सकता था इसलिए उसने अपने पड़ोसी से मदद मांगी लेकिन कोई भी व्यक्ति उसे या उसके बच्चे को सहारा देने के लिए आगे नहीं आया लक्ष्मण ने हताश होकर रिश्तेदारों को फोन

लगाया लेकिन कोई नहीं आया 15 घंटे तक मां-बाप का शव घर के अंदर ही पड़ा रहा तथा यह खबर किसी तरह 35 साल के युवा ईरतिज़ा कुरैश को मिली और इस विषय में सुबह 4:00 बजे ही बुरारी थाने पहुंच जाते हैं

और वह तिवारी परिवार की मदद के लिए बहुत गुहार लगाते हैं लेकिन कहीं से कोई मदद नहीं मिलती पुलिस द्वारा भी यह कहा जाता है कि हमारे पास ऐसी कोई सुविधा नहीं है और आप 102 या 112 से संपर्क करें उसने बिना किसी देरी के 102 नंबर पर कॉल किया तो उसे वहां से जवाब मिलता है कि हमारे पास करोना वायरस के मरीजों की लाशों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है हमें केवल जीवित रोगियों के मामले को संभालने की जिम्मेदारी मिली है 112 नंबर डायल करने पर उन्हें अजीबो गरीब चीजे बताई जाती है आप जस्टडायल के लिए प्रयास क्यों नहीं

करते और नंबर क्यों नहीं लेते हैं ईरतिज़ा कुरैशी को कोई भी कहीं से मदद ना मिलने के कारण उसने सामाजिक संगठनों की मदद मांगनी शुरू की

बहुत मुश्किल से एक संगठन तैयार होता है तो वह शर्त लगा देता है किशव को श्मशान के बाहर ही छोड़ आएंगे ड्राइवर हाथ लगाएगा तो ₹8000

बहुत मुश्किल से एक संगठन तैयार होता है तो वह शर्त लगा देता है कि शव को श्मशान के बाहर ही छोड़ आएंगे ड्राइवर हाथ लगाएगा तो ₹8000 लेगा लेकिन लक्ष्मण तिवारी की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि वह खर्चा उठा सकता लक्ष्मण तिवारी के माता पिता का शव गर्मी के कारण गलने को आ रहा था इस दिशा मैं उसने पुलिस से गुहार लगाता है और बोलता है प्लीज इस परिवार की मदद कीजिए इस परिवार में एक 4 साल का बच्चा है जिसके ऊपर दिमागी रूप से क्या असर पड़ेगा इसलिए प्लीज इस स्थिति को समझिए और कुछ कीजिए

पुलिस मदद करने को फिर से इंकार कर देती है और वह उन्हें सलाह देती है कि आप श्मशान घाट जा कर देखिए वहां कोई एंबुलेंस होगी बिना किसी देरी के निगमबोध घाट जाते हैं वह बुरी स्थिति थी वहां पर अंतिम संस्कार के लिए कई घंटो तक इंतजार करना पड़ता लेकिन इतना टाइम नहीं था

उन्होंने हिंदुस्तान लाइव के फरहान याहिया से मदद मांगी और साथ ही DCP नॉर्थ दिल्ली को Tag किया बेब पोर्टल ने लाइव किया एक करोड़ लोगों ने देखा| लेकिन मदद को एक ही आया |उसका भी धर्म इस्लाम था करीब 22 घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद और इतना दुख उठाने के बाद लक्ष्मण के माता पिता का सम्मानजनक अंतिम संस्कार हुआ और उन्हें आखिरी विदाई देते हुए रोता हुआ अपने 4 साल के बेटे को गले लगाता है | और उसका 4 साल का बेटा लगभग 24 घंटे अपने दादा दादी की क्षत-विक्षत लाश को देखता है |और उसके पिता मदद की भीख मांगते हैं |इसके पश्चात भी एक भी व्यक्ति उनकी मदद के लिए आगे नहीं

वैसे हिंदुस्तान अपने भाईचारे के लिए जाना जाता था क्या यही वह समाज है जिसमें हम भाईचारा और एकता को देखते है हमारे आसपास ऐसे बहुत लोग हैं | जो हम से मदद की भीख मांगते हैं | लेकिन उनमें से बहुत कम लोग इस ईरतिज़ा कुरैशी जैसे सामने उभर कर आते हैं| वह 4 साल के बच्चे के लिए मिसाल बन कर आया था| आज भी हमारे देश में धर्म के नाम पर भेदभाव किए जाते हैं |लेकिन आगे भविष्य में जभी भी धर्मों को लेकर भेदभाव किया जाएगा तो लक्ष्मण तिवारी के 4 साल के बेटे उस विषय में जरूर अपनी टिप्पणी रखेगा और बताएगा कि धर्म से बड़ी इंसानियत होती है||

Kajal Manikya
Author: Kajal Manikya

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