अगर आपसे पूछा जाए कि बीजेपी की क्या विचारधारा है

अगर आपसे पूछा जाए कि बीजेपी की क्या विचारधारा है

अगर आपसे पूछा जाए कि बीजेपी की क्या विचारधारा है तो आप एकदम बता देंगे “हिंदुत्व”. अगर आप से पूछा जाए कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, डीएमके, एडीएमके, एनसीपी, तृणमूल, बीजेडी, इत्यादि की क्या विचारधारा है तो आप बगले झांकने लगेंगे.

ग़रीब हो या अमीर, पीएचडी हो या अंगूठा छाप, इंसान बग़ैर विचारधारा के जी ही नहीं सकता. विचारधारा का सीधा अर्थ होता है विचार की धारा. यानी विचारों का संगठित होकर जीवन जीने के लिए एक सहज रास्ता बन जाना.

ज़िंदा रहने के लिए इंसान को विचारधारा की उतनी ही ज़रूरत है है जितना की पानी की है. क्योंकि पल पल में इंसान को तय करना होता है कि उसके लिए अगला कौन सा सही रास्ता है.

जेम्स बॉन्ड की फ़िल्म Quantam of Solace के आख़ीर में जेम्स बॉन्ड विलेन की टांगें तोड़ कर चिलचिलाती धूप में उसको बीस मील रेगिस्तान में ले जाकर पटक देता है और उसके सामने एक डिब्बा मोटर ऑयल का फेंक कर कहता है, देखते हैं कितना दूर घसीट पाते हो अपने आप को बग़ैर ये मोटर ऑयल पिए. बाद में विलेन की लाश तीन मील दूर मिलती है और उसके पेट में मोटर ऑयल मिलता है.

कहने का अर्थ ये है कि ज़िंदा रहने की तड़प में हमें कुछ न कुछ तो पीना ही है. पानी नहीं मिलेगा तो मोटर ऑयल ही पिएँगे. हिंदुत्व वही मोटर ऑयल है जिसे पूरा देश पी रहा है कि क्योंकि जीवनदान करने वाली पानी जैसी विचारधारा कहीं है ही नहीं.

बग़ैर विचारधारा वाला समाज मुर्दा लाश है.

कांग्रेस वग़ैरह जैसी पार्टियाँ पहले ही मर चुकी हैं. बीजेपी ज़िंदा ज़रूर है मगर तब तक जब तक मोटर ऑयल उसको मौत नहीं दे देता है. मोटर ऑयल पीते और पिलाते हुए बीजेपी ख़ुद और देश को मौत के रास्ते ले जा रही है.

आज की ग़ैर-बीजेपी पार्टियों को ये डर है कि अगर हमने हिंदुत्व के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ी तो हम नेस्तनाबूद हो जाएँगे. ये वहम है.

1947 में हिंदू-मुस्लिम के नाम पर ही भारत का विभाजन हुआ. कुछ मुसलमानों ने अपने लिए अलग पाकिस्तान बना लिया. दो-तरफ़ी हिंसा में लाखों लोग मारे गए. करोड़ों बेघर हुए. इतना दर्द इस महाद्वीप के लोगों ने इतिहास में पहले नहीं देखा था.

इसके बावजूद आज़ाद भारत हिंदू भारत नहीं बना. ऐसा नहीं था कि नए भारत का राजा कोई तानाशाह था जिसने शाही फ़रमान देकर पुलिस को जनता के पीछे लगा दिया कि जो भारत को सेकुलर न माने उसको मौत के घाट उतार दो.

आज़ादी के समय भारत की आबादी चालीस करोड़ थी. जिसमें अस्सी फ़ीसदी से ज़्यादा हिंदू थे. नब्बे फ़ीसदी गाँव में रहते थे. बहुत बड़ा तबका बेहद ग़रीब और अनपढ़ था. तन पे कपड़ा नहीं था, पत्तल में खाना नहीं था.

फिर भी इस बेहद ग़रीब, अनपढ़, गंवार हिंदू बाहुल्य समाज ने तय किया कि, हाँ, हम सेकुलर रहेंगे. इसके बावजूद कि कुछ मुसलमानों ने अलग पाकिस्तान बना लिया है हम हिंदू राष्ट्र नहीं बनेंगे बल्कि सेकुलर देश बनेंगे जहाँ हर कोई बराबर का इंसान होगा.

और इसी समाज ने एक ऐसा संविधान बनाया जो सत्तर साल टिक गया. दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप और अमेरिका के बाहर भारत को छोड़ कर दुनिया का कोई देश नहीं हुआ जो ग़ुलामी से सीधे एक सफल और अडिग लोकतंत्र की शक्ल ले सका. ऐसी मिसाल पूरी दुनिया के इतिहास में नहीं मिलती है.

इसकी वजह ये थी कि आज़ादी के पहले से हमारे समाज में ज़ोरदार देशव्यापी मुहिम चली थी एक नए समाज की कल्पना की. तभी गाना लिखा गया छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी. ये महज़ कविता नहीं है. आज़ादी के बाद पहले तीस साल में पूरे देश में यही सोच थी, यही जोश था.

लेकिन आज भारत से पानी ख़त्म हो चुका है. सिर्फ़ मोटर ऑयल है.

वक़्त कम है. हमें फ़ौरन से पेश्तर दोबारा पानी खोजना होगा. गाँधी मर चुके. नेहरू मर चुके. हमको ही खोजना है. और अभी खोजना है.

Saujany se Ajit Sahi

B kumar Arihant
Author: B kumar Arihant

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