याचिका खारिज, याचिकाकर्ता से जुड़े लोग हिरासत में

सुप्रीम कोर्ट
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याचिका खारिज, याचिकाकर्ता से जुड़े लोग हिरासत में.

यह देश के न्यायिक इतिहास का संभवतः पहला मामला होगा जिसमे याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया और याचिकाकर्ता को उसके तुरंत बाद पुलिस ने हिरासत में ले लिया। याचिकाएं खारिज होती रहती हैं और याचिकाकर्ताओं पर जुर्माने भी लगा करते हैं, पर इधर याचिका खारिज हुई और उधर याचिकाकर्ता हिरासत में धर लिया गया। ऐसा पहली बार हुआ है। क्या यह एक संदेश के रूप में भी है कि बहुत अधिक याचिकाएं दायर नहीं की जानी चाहिए ? जिस याचिका के खारिज होने के बाद यह गिरफ्तारी हुई है, वह याचिका थी, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और अब प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी और 63 अन्य को 2002 के दंगों में गठित विशेष जांच दल की क्लीन चिट, जिसे गुजरात हाईकोर्ट ने बरकरार रखा था, की अपील, जो सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता जकिया जाफरी ने दायर किया था। इस संबंध में कई याचिकाएं तीस्ता सीतलवाड ने भी दायर की थीं। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ जिसमें, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार थे, ने यह याचिका खारिज कर दी और यह कहा कि, किसी साजिश का सुबूत एसआईटी को नहीं मिला है। साथ ही यह भी कहा कि, ” जकिया जाफरी की याचिका बेबुनियाद है, और सुझाव दिया कि एसआईटी ने जिस झूठ का पर्दाफाश किया था, उसका दावा करके “असंतुष्ट (गुजरात) अधिकारियों द्वारा, एक साथ मिलकर सनसनी पैदा करने” का प्रयास किया गया था।” यानी गुजरात दंगे में षडयंत्र की बात कहना अदालत को नागवार लगा।

मुकदमे का विस्तृत विवरण इस प्रकार है। 28 फरवरी 2002 को गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के कुछ डिब्बों में आगजनी की गई और इस घटना में लगभग 65 व्यक्ति जल कर मर गए। कहा जाता है कि ये सभी कारसेवक थे जो अयोध्या से गुजरात वापस लौट रहे थे। उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उसी के बाद गुजरात के कुछ शहरों में भयानक साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे। यह दंगे लंबे समय तक चले। इसी में यह आरोप लगा कि सरकार ने दंगो को रोकने के लिए उचित कदम समय से नहीं उठाए और जनधन की व्यापक हानि होती रही। यही वह दंगा था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने अहमदाबाद का दौरा किया था और मुख्यमंत्री को राजधर्म का पालन करने की सलाह दी थी। उसी दंगो की जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया गया जिसने दंगे के षडयंत्र की जांच में राज्य सरकार के उच्चतम स्तर पर किसी की लिप्तता के सुबूत नहीं पाए। एसआईटी की उसी जांच को जकिया जाफरी और तीस्ता सीतलवाड ने गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी और वहां से जब उनकी याचिका खारिज हो गई तो, उसकी अपील सुप्रीम कोर्ट में की गई जहां से यह याचिकाएं फिर खारिज कर दीं गई।

यह एक स्थापित न्यायिक प्रक्रिया है कि, कोई भी व्यक्ति अपनी अपील कानून के अनुसार उच्चतर न्यायालयों में कर सकता है और सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च न्यायिक पीठ है जहां उस मामले का अंतिम निपटारा होता है। इस केस में भी यही हुआ। पर इस केस में वह भी हुआ जो आज तक किसी भी केस में नहीं हुआ है कि याचिका कर्ता को याचिका के खारिज करने के बाद गिरफ्तार कर लिया जाय। यह न्याय का एक अजीब और गरीब पहलू दोनो है। अपील को खारिज करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि,
“केवल राज्य प्रशासन की निष्क्रियता या विफलता के आधार पर साजिश का आसानी से अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।”

आगे कहा गया है कि,
“राज्य प्रशासन के एक वर्ग के कुछ अधिकारियों की निष्क्रियता या विफलता राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा पूर्व नियोजित आपराधिक साजिश का अनुमान लगाने या इसे राज्य प्रायोजित अपराध (हिंसा) के रूप में परिभाषित करने का आधार नहीं हो सकती है।
एसआईटी ने पाया था कि दोषी अधिकारियों की निष्क्रियता और लापरवाही को, उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए, उचित स्तर संज्ञान लिया गया है।”

अब आगे पढ़िए,
“इस तरह की निष्क्रियता या लापरवाही, एक आपराधिक साजिश रचने का आधार नहीं बन सकती है। इसके लिए अपराध के कृत्य या योजना में किसी की भागीदारी स्पष्ट रूप से सामने आनी चाहिए। एसआईटी इन मुकदमों की जांच करने के लिए नहीं बनाई गई थी। बल्कि, राज्य प्रशासन की गंभीर विफलताओं और उच्चतम स्तर पर संगठित साजिश की जांच करने के लिए इस न्यायालय द्वारा बनाई गई थी।”
यह कहना है, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, दिनेश माहेश्वरी और सीटी रविकुमार की पीठ द्वारा दिये गए फैसले में।

अदालत की उपरोक्त टिप्पणी, याचिकाकर्ता जकिया जाफरी के एडवोकेट, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल द्वारा उठाए गए तर्कों के संदर्भ में है। कपिल सिब्बल ने कहा था,
“दंगाइयों को नियंत्रित करने के लिए उचित कार्रवाई करने में राज्य प्रशासन और पुलिस मशीनरी की विफलता थी और सांप्रदायिक बिल्ड-अप के बारे में खुफिया जानकारी की अनदेखी की गई थी।”

साजिश के विंदु पर पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि,
“बड़े आपराधिक साजिश का मामला बनाने के लिए, राज्य भर में संबंधित अवधि के दौरान किए गए अपराध (अपराधों) के लिए, संबंधित व्यक्तियों के दिमाग में क्या चल रहा है, इन सबमें, साज़िश का लिंक स्थापित करना आवश्यक है।”
इस संदर्भ में कहा गया है कि,
“इस प्रकार की कोई कड़ी अदालत के सामने नहीं आ रही है। इस न्यायालय के निर्देशों के तहत एक ही एसआईटी द्वारा जांचे गए नौ मामलों में से किसी में भी ऐसा खुलासा और साज़िश स्थापित नहीं किया गया था।”

पीठ ने दोहराया कि,
“संबंधित अधिकारियों द्वारा की गई निष्क्रियता या प्रभावी उपायों का अभाव, राज्य के अधिकारियों की ओर से की गई आपराधिक साजिश नहीं मानी जा सकती है। खुफिया एजेंसियों के संदेशों पर कार्रवाई करने में विफलता को आपराधिक साजिश का कार्य नहीं माना जा सकता है जब तक कि सम्बंधित लोगों की बैठक में, क्या सोचा गया था, के संबंध में ज़रूरी साज़िश के लिंक प्रदान करने के लिए सामग्री न हो और राज्य भर में सामूहिक हिंसा फैलाने की योजना को प्रभावित करने के लिए जानबूझकर कोई कार्य न किया जाये।”

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह भी कहा कि,
“गोधरा ट्रेन कांड के बाद की घटनाएं “त्वरित प्रतिक्रिया” में हुईं और अगले ही दिन, 28 फरवरी, 2002 को सेना के अतिरिक्त टुकड़ी की मांग कर दी गई और अशांत क्षेत्रों में कर्फ्यू लगा दिया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार सार्वजनिक आश्वासन दिया था कि दोषियों को दंडित किया जाएगा। राज्य सरकार द्वारा सही समय पर किए गए इस तरह के सुधारात्मक उपायों के आलोक में और तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा बार-बार सार्वजनिक आश्वासन दिया गया कि दोषियों को उनके अपराध के लिए दंडित किया जाएगा, और शांति बनाए रखी जाएगी, में साज़िश के सुबूत स्पष्ट नहीं होते हैं। नामजद अपराधियों के मन मस्तिष्क में उच्चतम स्तर पर साजिश रचने के बारे में संदेह का उपजना मुश्किल है। न्याय की बात करने वाले महानुभाव, अपने वातानुकूलित कार्यालय के एक आरामदायक वातावरण में बैठकर ऐसी भयावह स्थिति के दौरान विभिन्न स्तरों पर राज्य प्रशासन की विफलताओं के तार, जोड़ने में सफल हो सकते हैं। यहां तक कि जमीनी हकीकत को कम जानते हुए या, यहां तक कि जमीनी हकीकत का जिक्र करते हुये, लगातार प्रयास करने में सफल हो सकते हैं। लेकिन, राज्य भर में सामूहिक हिंसा के बाद सामने आने वाली स्वाभाविक रूप से अशांति की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए क्या प्रयास किया गया इसे भी देखा जाना चाहिये। थोड़े समय के लिए प्रशासनिक मशीनरी का बिखराव, संवैधानिक तंत्र के टूटने का मामला नहीं कहा जा सकता है।”

कोर्ट ने कहा कि,
“आपातकाल के समय में राज्य प्रशासन का बिखर जाना कोई ऐसी घटना नहीं है जिसे सब न जानते हों और COVID महामारी के दौरान, दबाव में चरमरा रही स्वास्थ्य सुविधाएं, सबसे अच्छी सुविधाओं वाली सरकारों में भी देखी गई।”
फिर कोर्ट ने पूछा,
“क्या इसे आपराधिक साजिश रचने का मामला कहा जा सकता है?
इसी प्रकार,
“कम अवधि के लिए, कानून-व्यवस्था के सिस्टम का टूटना, कानून के शासन या संवैधानिक संकट के ध्वस्त होने का प्रमाण नहीं कहा जा सकता है। इसे अलग तरह से कहें तो, अल्पकालिक प्रशासनिक विफलता को, कानून-व्यवस्था बनाए रखने की विफलता नहीं मानी जा सकती है। संविधान के अनुच्छेद 356 में सन्निहित सिद्धांतों के संदर्भ में संवैधानिक तंत्र की विफलता का मामला देखा जा सकता है। कानून-व्यवस्था की स्थिति को विफल करने में की स्थिति को, राज्य प्रायोजित ध्वंस, मानने के बारे में कोई न कोई विश्वसनीय सबूत होना चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट ने 27 फरवरी को तत्कालीन मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक के संबंध में संजीव भट्ट आईपीएस, गुजरात के तत्कालीन मंत्री हरेन पंड्या, तत्कालीन एडीजीपी आरबी श्रीकुमार द्वारा लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया और कहा कि,
“हम प्रतिवादी-राज्य के तर्क में बल पाते हैं कि श्री संजीव भट्ट, श्री हरेन पंड्या और श्री आर.बी. श्रीकुमार की गवाही केवल मुद्दों में सनसनीखेज और राजनीतिकरण करने के लिए थी। जिन व्यक्तियों को उक्त बैठक की जानकारी नहीं थी, जहां कथित तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा कथित तौर पर बयान दिए गए थे, उन्होंने खुद को चश्मदीद गवाह होने का झूठा दावा किया और एसआईटी द्वारा गहन जांच के बाद, यह स्पष्ट हो गया कि बैठक में उपस्थित होने का उनका दावा मिथ्या था। इस तरह के झूठे दावे पर, उच्चतम स्तर पर बड़े आपराधिक साजिश रचने का ढांचा खड़ा किया गया है जो, ताश के पत्तों की तरह ढह गया।”
एसआईटी जांच की सराहना करते हुए अदालत ने कहा कि
“हम एसआईटी अधिकारियों की टीम द्वारा चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में किए गए अथक कार्य के लिए अपनी प्रशंसा व्यक्त करते हैं और फिर भी, हम पाते हैं कि उन्होंने इस जांच में मेहनत की है।”

2002 के गुजरात दंगों के दौरान गुलबर्ग सोसाइटी हत्याकांड में मारे गए कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की विधवा जकिया जाफरी ने गुजरात उच्च न्यायालय के अक्टूबर 2017 के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी, जिसने एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया था। हालांकि, गुजरात उच्च न्यायालय ने जकिया जाफरी को पुनः जांच की मांग करने की स्वतंत्रता दे दी थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आगे की जांच के लिए भी कोई सामग्री नहीं है और एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट को वैसे ही स्वीकार किया जाना चाहिए जैसे वह है, और कुछ नहीं।
“आगे की जांच का सवाल उच्चतम स्तर पर बड़े षड्यंत्र के आरोप के संबंध में नई सामग्री/सूचना की उपलब्धता पर ही उठता, जो इस मामले में सामने नहीं आ रहा है। इसलिए, एसआईटी द्वारा प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट, , इसे और कुछ किए बिना स्वीकार किया जाना चाहिए।”

अदालत ने यह कहा है कि
“यदि प्रशासनिक मशीनरी बिखरती भी है तो उसे किसी साजिश का अंश नहीं माना जा सकता जब तक कि साजिशकर्ता का दिमाग पढ़ न लिया जाय।”
अदालत यहां मेंसेरिया की बात कह रही है। मेंसेरियां का निर्धारण कृत्यों से भी किया जाता है क्योंकि किसी के दिमाग में क्या चल रहा है यह उसके कृत्यों से ही स्पष्ट हो सकेगा। गुजरात में जिस तरह से लम्बे समय तक दंगा चला, सेना बुलाई गई पर सेना को ड्यूटी पर देर से उतारा गया, जैसा कि यह भी एक आरोप है, जकिया जाफरी के पति एहसान जाफरी की मुख्यमंत्री से हुई बातचीत और उसके बाद भी उन्हें सुरक्षा तत्काल न उपलब्ध कराने के आरोप जैसा कि जकिया जाफरी बार बार कह रही हैं, आदि खबरें तब भी अखबारों में छपी थीं और अब फिर वे प्रकाशित हो रही हैं, तो उन खबरों को देखते हुए किसी के भी मन में साजिश का संशय स्वाभाविक रूप से उठेगा। गुजरात दंगो पर ऐसा नहीं है कि केवल गुजरात या भारत के ही अखबारों और मीडिया में यह सब छप और दिखाया जा रहा था बल्कि विश्व मीडिया में यह सब बराबर सुर्खियों में छाया रहा। लेकिन एसआईटी, साजिश के कोण को साबित नहीं कर पाई और जो एसआईटी ने किया उसे सुप्रीम कोर्ट ने भी जस का तस स्वीकार कर लिया और यह याचिका खारिज कर दी।

सबसे अधिक हैरानी की बात है कि, गुजरात पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा, क्लीन चिट की पुष्टि करने के एक दिन बाद तीस्ता सीतलवाड़ को हिरासत में ले लिया है और वह गुजरात दंगों के पीछे कथित बड़ी साजिश की जांच की मांग करने वाली याचिकाकर्ताओं में से एक थीं। उनके साथ ही आरबी श्रीकुमार जो दंगे के समय गुजरात के डीजीपी थे को भी गिरफ्तार किया गया है। इनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी गुजरात दंगों की साजिश के मामले में सबूत गढ़ने और झूठी कार्यवाही शुरू करने के आरोपों पर है। गुजरात पुलिस की शिकायत में तीस्ता सीतलवाड, सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी आरबी श्रीकुमार और जेल की सजा भुगत रहे, पूर्व आईपीएस (गुजरात) संजीव भट्ट का नाम जालसाजी (468,471), झूठे सबूत देने (194), साजिश (120 बी), झूठे रिकॉर्ड बनाने (218), का आरोप है। गुजरात पुलिस की शिकायत में कहा गया है,
“पर्दे के पीछे की आपराधिक साजिश और अन्य व्यक्तियों, संस्थाओं और संगठनों की मिलीभगत से विभिन्न गंभीर अपराधों के लिए वित्तीय और अन्य लाभों का पता लगाने के लिए यह कार्यवाही की गई है।”

(विजय शंकर सिंह)

http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/06/blog-post_25.html
सुप्रीम कोर्ट
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याचिका खारिज, याचिकाकर्ता से जुड़े लोग हिरासत में.

यह देश के न्यायिक इतिहास का संभवतः पहला मामला होगा जिसमे याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया और याचिकाकर्ता को उसके तुरंत बाद पुलिस ने हिरासत में ले लिया। याचिकाएं खारिज होती रहती हैं और याचिकाकर्ताओं पर जुर्माने भी लगा करते हैं, पर इधर याचिका खारिज हुई और उधर याचिकाकर्ता हिरासत में धर लिया गया। ऐसा पहली बार हुआ है। क्या यह एक संदेश के रूप में भी है कि बहुत अधिक याचिकाएं दायर नहीं की जानी चाहिए ? जिस याचिका के खारिज होने के बाद यह गिरफ्तारी हुई है, वह याचिका थी, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और अब प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी और 63 अन्य को 2002 के दंगों में गठित विशेष जांच दल की क्लीन चिट, जिसे गुजरात हाईकोर्ट ने बरकरार रखा था, की अपील, जो सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता जकिया जाफरी ने दायर किया था। इस संबंध में कई याचिकाएं तीस्ता सीतलवाड ने भी दायर की थीं। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ जिसमें, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार थे, ने यह याचिका खारिज कर दी और यह कहा कि, किसी साजिश का सुबूत एसआईटी को नहीं मिला है। साथ ही यह भी कहा कि, ” जकिया जाफरी की याचिका बेबुनियाद है, और सुझाव दिया कि एसआईटी ने जिस झूठ का पर्दाफाश किया था, उसका दावा करके “असंतुष्ट (गुजरात) अधिकारियों द्वारा, एक साथ मिलकर सनसनी पैदा करने” का प्रयास किया गया था।” यानी गुजरात दंगे में षडयंत्र की बात कहना अदालत को नागवार लगा।

मुकदमे का विस्तृत विवरण इस प्रकार है। 28 फरवरी 2002 को गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के कुछ डिब्बों में आगजनी की गई और इस घटना में लगभग 65 व्यक्ति जल कर मर गए। कहा जाता है कि ये सभी कारसेवक थे जो अयोध्या से गुजरात वापस लौट रहे थे। उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उसी के बाद गुजरात के कुछ शहरों में भयानक साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे। यह दंगे लंबे समय तक चले। इसी में यह आरोप लगा कि सरकार ने दंगो को रोकने के लिए उचित कदम समय से नहीं उठाए और जनधन की व्यापक हानि होती रही। यही वह दंगा था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने अहमदाबाद का दौरा किया था और मुख्यमंत्री को राजधर्म का पालन करने की सलाह दी थी। उसी दंगो की जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया गया जिसने दंगे के षडयंत्र की जांच में राज्य सरकार के उच्चतम स्तर पर किसी की लिप्तता के सुबूत नहीं पाए। एसआईटी की उसी जांच को जकिया जाफरी और तीस्ता सीतलवाड ने गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी और वहां से जब उनकी याचिका खारिज हो गई तो, उसकी अपील सुप्रीम कोर्ट में की गई जहां से यह याचिकाएं फिर खारिज कर दीं गई।

यह एक स्थापित न्यायिक प्रक्रिया है कि, कोई भी व्यक्ति अपनी अपील कानून के अनुसार उच्चतर न्यायालयों में कर सकता है और सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च न्यायिक पीठ है जहां उस मामले का अंतिम निपटारा होता है। इस केस में भी यही हुआ। पर इस केस में वह भी हुआ जो आज तक किसी भी केस में नहीं हुआ है कि याचिका कर्ता को याचिका के खारिज करने के बाद गिरफ्तार कर लिया जाय। यह न्याय का एक अजीब और गरीब पहलू दोनो है। अपील को खारिज करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि,
“केवल राज्य प्रशासन की निष्क्रियता या विफलता के आधार पर साजिश का आसानी से अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।”

आगे कहा गया है कि,
“राज्य प्रशासन के एक वर्ग के कुछ अधिकारियों की निष्क्रियता या विफलता राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा पूर्व नियोजित आपराधिक साजिश का अनुमान लगाने या इसे राज्य प्रायोजित अपराध (हिंसा) के रूप में परिभाषित करने का आधार नहीं हो सकती है।
एसआईटी ने पाया था कि दोषी अधिकारियों की निष्क्रियता और लापरवाही को, उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए, उचित स्तर संज्ञान लिया गया है।”

अब आगे पढ़िए,
“इस तरह की निष्क्रियता या लापरवाही, एक आपराधिक साजिश रचने का आधार नहीं बन सकती है। इसके लिए अपराध के कृत्य या योजना में किसी की भागीदारी स्पष्ट रूप से सामने आनी चाहिए। एसआईटी इन मुकदमों की जांच करने के लिए नहीं बनाई गई थी। बल्कि, राज्य प्रशासन की गंभीर विफलताओं और उच्चतम स्तर पर संगठित साजिश की जांच करने के लिए इस न्यायालय द्वारा बनाई गई थी।”
यह कहना है, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, दिनेश माहेश्वरी और सीटी रविकुमार की पीठ द्वारा दिये गए फैसले में।

अदालत की उपरोक्त टिप्पणी, याचिकाकर्ता जकिया जाफरी के एडवोकेट, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल द्वारा उठाए गए तर्कों के संदर्भ में है। कपिल सिब्बल ने कहा था,
“दंगाइयों को नियंत्रित करने के लिए उचित कार्रवाई करने में राज्य प्रशासन और पुलिस मशीनरी की विफलता थी और सांप्रदायिक बिल्ड-अप के बारे में खुफिया जानकारी की अनदेखी की गई थी।”

साजिश के विंदु पर पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि,
“बड़े आपराधिक साजिश का मामला बनाने के लिए, राज्य भर में संबंधित अवधि के दौरान किए गए अपराध (अपराधों) के लिए, संबंधित व्यक्तियों के दिमाग में क्या चल रहा है, इन सबमें, साज़िश का लिंक स्थापित करना आवश्यक है।”
इस संदर्भ में कहा गया है कि,
“इस प्रकार की कोई कड़ी अदालत के सामने नहीं आ रही है। इस न्यायालय के निर्देशों के तहत एक ही एसआईटी द्वारा जांचे गए नौ मामलों में से किसी में भी ऐसा खुलासा और साज़िश स्थापित नहीं किया गया था।”

पीठ ने दोहराया कि,
“संबंधित अधिकारियों द्वारा की गई निष्क्रियता या प्रभावी उपायों का अभाव, राज्य के अधिकारियों की ओर से की गई आपराधिक साजिश नहीं मानी जा सकती है। खुफिया एजेंसियों के संदेशों पर कार्रवाई करने में विफलता को आपराधिक साजिश का कार्य नहीं माना जा सकता है जब तक कि सम्बंधित लोगों की बैठक में, क्या सोचा गया था, के संबंध में ज़रूरी साज़िश के लिंक प्रदान करने के लिए सामग्री न हो और राज्य भर में सामूहिक हिंसा फैलाने की योजना को प्रभावित करने के लिए जानबूझकर कोई कार्य न किया जाये।”

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह भी कहा कि,
“गोधरा ट्रेन कांड के बाद की घटनाएं “त्वरित प्रतिक्रिया” में हुईं और अगले ही दिन, 28 फरवरी, 2002 को सेना के अतिरिक्त टुकड़ी की मांग कर दी गई और अशांत क्षेत्रों में कर्फ्यू लगा दिया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार सार्वजनिक आश्वासन दिया था कि दोषियों को दंडित किया जाएगा। राज्य सरकार द्वारा सही समय पर किए गए इस तरह के सुधारात्मक उपायों के आलोक में और तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा बार-बार सार्वजनिक आश्वासन दिया गया कि दोषियों को उनके अपराध के लिए दंडित किया जाएगा, और शांति बनाए रखी जाएगी, में साज़िश के सुबूत स्पष्ट नहीं होते हैं। नामजद अपराधियों के मन मस्तिष्क में उच्चतम स्तर पर साजिश रचने के बारे में संदेह का उपजना मुश्किल है। न्याय की बात करने वाले महानुभाव, अपने वातानुकूलित कार्यालय के एक आरामदायक वातावरण में बैठकर ऐसी भयावह स्थिति के दौरान विभिन्न स्तरों पर राज्य प्रशासन की विफलताओं के तार, जोड़ने में सफल हो सकते हैं। यहां तक कि जमीनी हकीकत को कम जानते हुए या, यहां तक कि जमीनी हकीकत का जिक्र करते हुये, लगातार प्रयास करने में सफल हो सकते हैं। लेकिन, राज्य भर में सामूहिक हिंसा के बाद सामने आने वाली स्वाभाविक रूप से अशांति की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए क्या प्रयास किया गया इसे भी देखा जाना चाहिये। थोड़े समय के लिए प्रशासनिक मशीनरी का बिखराव, संवैधानिक तंत्र के टूटने का मामला नहीं कहा जा सकता है।”

कोर्ट ने कहा कि,
“आपातकाल के समय में राज्य प्रशासन का बिखर जाना कोई ऐसी घटना नहीं है जिसे सब न जानते हों और COVID महामारी के दौरान, दबाव में चरमरा रही स्वास्थ्य सुविधाएं, सबसे अच्छी सुविधाओं वाली सरकारों में भी देखी गई।”
फिर कोर्ट ने पूछा,
“क्या इसे आपराधिक साजिश रचने का मामला कहा जा सकता है?
इसी प्रकार,
“कम अवधि के लिए, कानून-व्यवस्था के सिस्टम का टूटना, कानून के शासन या संवैधानिक संकट के ध्वस्त होने का प्रमाण नहीं कहा जा सकता है। इसे अलग तरह से कहें तो, अल्पकालिक प्रशासनिक विफलता को, कानून-व्यवस्था बनाए रखने की विफलता नहीं मानी जा सकती है। संविधान के अनुच्छेद 356 में सन्निहित सिद्धांतों के संदर्भ में संवैधानिक तंत्र की विफलता का मामला देखा जा सकता है। कानून-व्यवस्था की स्थिति को विफल करने में की स्थिति को, राज्य प्रायोजित ध्वंस, मानने के बारे में कोई न कोई विश्वसनीय सबूत होना चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट ने 27 फरवरी को तत्कालीन मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक के संबंध में संजीव भट्ट आईपीएस, गुजरात के तत्कालीन मंत्री हरेन पंड्या, तत्कालीन एडीजीपी आरबी श्रीकुमार द्वारा लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया और कहा कि,
“हम प्रतिवादी-राज्य के तर्क में बल पाते हैं कि श्री संजीव भट्ट, श्री हरेन पंड्या और श्री आर.बी. श्रीकुमार की गवाही केवल मुद्दों में सनसनीखेज और राजनीतिकरण करने के लिए थी। जिन व्यक्तियों को उक्त बैठक की जानकारी नहीं थी, जहां कथित तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा कथित तौर पर बयान दिए गए थे, उन्होंने खुद को चश्मदीद गवाह होने का झूठा दावा किया और एसआईटी द्वारा गहन जांच के बाद, यह स्पष्ट हो गया कि बैठक में उपस्थित होने का उनका दावा मिथ्या था। इस तरह के झूठे दावे पर, उच्चतम स्तर पर बड़े आपराधिक साजिश रचने का ढांचा खड़ा किया गया है जो, ताश के पत्तों की तरह ढह गया।”
एसआईटी जांच की सराहना करते हुए अदालत ने कहा कि
“हम एसआईटी अधिकारियों की टीम द्वारा चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में किए गए अथक कार्य के लिए अपनी प्रशंसा व्यक्त करते हैं और फिर भी, हम पाते हैं कि उन्होंने इस जांच में मेहनत की है।”

2002 के गुजरात दंगों के दौरान गुलबर्ग सोसाइटी हत्याकांड में मारे गए कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की विधवा जकिया जाफरी ने गुजरात उच्च न्यायालय के अक्टूबर 2017 के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी, जिसने एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया था। हालांकि, गुजरात उच्च न्यायालय ने जकिया जाफरी को पुनः जांच की मांग करने की स्वतंत्रता दे दी थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आगे की जांच के लिए भी कोई सामग्री नहीं है और एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट को वैसे ही स्वीकार किया जाना चाहिए जैसे वह है, और कुछ नहीं।
“आगे की जांच का सवाल उच्चतम स्तर पर बड़े षड्यंत्र के आरोप के संबंध में नई सामग्री/सूचना की उपलब्धता पर ही उठता, जो इस मामले में सामने नहीं आ रहा है। इसलिए, एसआईटी द्वारा प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट, , इसे और कुछ किए बिना स्वीकार किया जाना चाहिए।”

अदालत ने यह कहा है कि
“यदि प्रशासनिक मशीनरी बिखरती भी है तो उसे किसी साजिश का अंश नहीं माना जा सकता जब तक कि साजिशकर्ता का दिमाग पढ़ न लिया जाय।”
अदालत यहां मेंसेरिया की बात कह रही है। मेंसेरियां का निर्धारण कृत्यों से भी किया जाता है क्योंकि किसी के दिमाग में क्या चल रहा है यह उसके कृत्यों से ही स्पष्ट हो सकेगा। गुजरात में जिस तरह से लम्बे समय तक दंगा चला, सेना बुलाई गई पर सेना को ड्यूटी पर देर से उतारा गया, जैसा कि यह भी एक आरोप है, जकिया जाफरी के पति एहसान जाफरी की मुख्यमंत्री से हुई बातचीत और उसके बाद भी उन्हें सुरक्षा तत्काल न उपलब्ध कराने के आरोप जैसा कि जकिया जाफरी बार बार कह रही हैं, आदि खबरें तब भी अखबारों में छपी थीं और अब फिर वे प्रकाशित हो रही हैं, तो उन खबरों को देखते हुए किसी के भी मन में साजिश का संशय स्वाभाविक रूप से उठेगा। गुजरात दंगो पर ऐसा नहीं है कि केवल गुजरात या भारत के ही अखबारों और मीडिया में यह सब छप और दिखाया जा रहा था बल्कि विश्व मीडिया में यह सब बराबर सुर्खियों में छाया रहा। लेकिन एसआईटी, साजिश के कोण को साबित नहीं कर पाई और जो एसआईटी ने किया उसे सुप्रीम कोर्ट ने भी जस का तस स्वीकार कर लिया और यह याचिका खारिज कर दी।

सबसे अधिक हैरानी की बात है कि, गुजरात पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा, क्लीन चिट की पुष्टि करने के एक दिन बाद तीस्ता सीतलवाड़ को हिरासत में ले लिया है और वह गुजरात दंगों के पीछे कथित बड़ी साजिश की जांच की मांग करने वाली याचिकाकर्ताओं में से एक थीं। उनके साथ ही आरबी श्रीकुमार जो दंगे के समय गुजरात के डीजीपी थे को भी गिरफ्तार किया गया है। इनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी गुजरात दंगों की साजिश के मामले में सबूत गढ़ने और झूठी कार्यवाही शुरू करने के आरोपों पर है। गुजरात पुलिस की शिकायत में तीस्ता सीतलवाड, सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी आरबी श्रीकुमार और जेल की सजा भुगत रहे, पूर्व आईपीएस (गुजरात) संजीव भट्ट का नाम जालसाजी (468,471), झूठे सबूत देने (194), साजिश (120 बी), झूठे रिकॉर्ड बनाने (218), का आरोप है। गुजरात पुलिस की शिकायत में कहा गया है,
“पर्दे के पीछे की आपराधिक साजिश और अन्य व्यक्तियों, संस्थाओं और संगठनों की मिलीभगत से विभिन्न गंभीर अपराधों के लिए वित्तीय और अन्य लाभों का पता लगाने के लिए यह कार्यवाही की गई है।”

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