भारत और नेपाल के बीच बेटी-रोटी का रिश्ता है

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भारत और नेपाल दुनिया के दो ऐसे देश हैं, जिनकी बहुसंख्यक आबादी हिंदू है. दोनों मुल्कों में न केवल धार्मिक समानता है बल्कि सांस्कृतिक समानता भी है.

हिन्दी और नेपाली भाषा को भी देखें, तो न केवल लिपि देवनागरी है बल्कि शब्दावलियाँ भी एक जैसी हैं. जो हिन्दी जानता या पढ़ता है, वो थोड़ी बहुत नेपाली भी पढ़ और समझ सकता है.

तकिया कलाम की तरह एक बात अक्सर कही जाती है कि नेपाल और भारत के बीच बेटी-रोटी का रिश्ता है. नेपाल की सीमा तीन तरफ़ से भारत से जुड़ी है और एक तरफ़ तिब्बत की सीमा लगती है. इतना कुछ होने के बावजूद नेपाल और भारत के रिश्ते आजकल ठीक नहीं हैं.

तीसरे दौरे में मोदी ने नेपाल से रिश्ते दुरुस्त करने में धार्मिक रास्ते का सहारा लिया था, इस दौरे में मोदी सीधे जनकपुर गए और फिर मुक्तिनाथ

प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने पिछले कार्यकाल में चार सालों के भीतर नेपाल के तीन दौरे किए थे. मोदी का तीसरा नेपाल दौरा मई 2018 में था. तीसरे दौरे में मोदी ने नेपाल से रिश्ते दुरुस्त करने में धार्मिक रास्ते का सहारा लिया था. इस दौरे में मोदी सीधे जनकपुर गए और फिर मुक्तिनाथ.

ये दोनों जगहें हिंदू धर्मावलंबियों के लिए अहम हैं. जनकपुर के मंदिर में पूजा करने के बाद मोदी काठमांडू गए थे. पहले के दौरे में भी मोदी पशुपतिनाथ मंदिर गए थे. ज़ाहिर है कि मोदी जब नेपाल के मंदिरों में जाते होंगे, तो उनके मन में दोनों देशों में व्यापक स्तर पर धार्मिक पहचान की समानता रहती होगी.
इसके बावजूद मोदी सरकार में नेपाल से रिश्ते कई मामलों में ऐतिहासिक रूप से ख़राब हुए हैं.आख़िर ऐसा क्यों है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए और दूसरे कई मुद्दों पर बीबीसी हिन्दी ने नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली से फ़ोन पर बातचीत की.

इसके बावजूद मोदी सरकार में नेपाल से रिश्ते कई मामलों में ऐतिहासिक रूप से ख़राब हुए हैं.आख़िर ऐसा क्यों है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए और दूसरे कई मुद्दों पर बीबीसी हिन्दी ने नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली से फ़ोन पर बातचीत की.

2008 में नेपाल में जब राजशाही लंबे आंदोलन के बाद ख़त्म हुई, तो लोकतंत्र स्थापित हुआ और संविधान बनने की प्रक्रिया शुरू हुई

2008 में नेपाल में जब राजशाही लंबे आंदोलन के बाद ख़त्म हुई, तो लोकतंत्र स्थापित हुआ और संविधान बनने की प्रक्रिया शुरू हुई.

सितंबर 2015 में नेपाल ने अपना नया संविधान लागू किया और इसमें नेपाल को सेक्युलर स्टेट बताया गया. ऐसा तब हुआ जब भारत में एक हिंदुत्व विचारधारा वाली पार्टी के पोस्टर बॉय माने जाने वाले नरेंद्र मोदी की सरकार थी.

26 मई 2006 को बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा था, ”नेपाल की मौलिक पहचान एक हिंदू राष्ट्र की है और इस पहचान को मिटने नहीं देना चाहिए. बीजेपी इस बात से ख़ुश नहीं होगी कि नेपाल अपनी मौलिक पहचान माओवादियों के दबाव में खो दे.”

राजशाही के दौरान नेपाल एक हिंदू राष्ट्र के तौर पर जाना जाता था. तब नेपाल दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र था

राजशाही के दौरान नेपाल एक हिंदू राष्ट्र के तौर पर जाना जाता था. तब नेपाल दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र था.

नेपाल-चीन सीमा विवाद: क्या नेपाल भारत की तरह चीन के ख़िलाफ़ भी सख़्त रवैया अपनाएगा?

नेपाल-भारत के कड़वे होते रिश्तों के बीच किधर हैं मधेशी?

भारत-नेपाल विवाद में चीनी राजदूत की क्या है भूमिका

नेपाल धर्मनिरपेक्ष देश न बने, इसे लेकर क्या भारत दबाव बना रहा था?
दो अक्तूबर 2015 को भारत सरकार के प्रतिनिधि बनकर नेपाल गए भगत सिंह कोश्यारी ने नेपाली अख़बार नया पत्रिका को एक इंटरव्यू दिया था.

2008 में नेपाल में जब राजशाही लंबे आंदोलन के बाद ख़त्म हुई, तो लोकतंत्र स्थापित हुआ और संविधान बनने की प्रक्रिया शुरू हुई.

सितंबर 2015 में नेपाल ने अपना नया संविधान लागू किया और इसमें नेपाल को सेक्युलर स्टेट बताया गया. ऐसा तब हुआ जब भारत में एक हिंदुत्व विचारधारा वाली पार्टी के पोस्टर बॉय माने जाने वाले नरेंद्र मोदी की सरकार थी.

26 मई 2006 को बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा था, ”नेपाल की मौलिक पहचान एक हिंदू राष्ट्र की है और इस पहचान को मिटने नहीं देना चाहिए. बीजेपी इस बात से ख़ुश नहीं होगी कि नेपाल अपनी मौलिक पहचान माओवादियों के दबाव में खो दे.”

राजशाही के दौरान नेपाल एक हिंदू राष्ट्र के तौर पर जाना जाता था. तब नेपाल दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र था

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नेपाल धर्मनिरपेक्ष देश न बने, इसे लेकर क्या भारत दबाव बना रहा था?
दो अक्तूबर 2015 को भारत सरकार के प्रतिनिधि बनकर नेपाल गए भगत सिंह कोश्यारी ने नेपाली अख़बार नया पत्रिका को एक इंटरव्यू दिया था
इस इंटरव्यू में कोश्यारी ने कहा था, ”मैंने प्रचंड से डेढ़ घंटे बात की थी. इस बातचीत के दौरान मैंने उनसे कहा कि आपलोग नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने के मूड में नहीं हैं, लेकिन संविधान से धर्मनिरपेक्ष शब्द हटा दीजिए. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी यही चाहती हैं. तब प्रचंड ने बीच का कोई रास्ता निकालने की बात कही थी, लेकिन वो नहीं माने.”

इस सवाल पर कि भगत सिंह कोशियारी की बात कितनी सच है, क्या भारत कोई दबाव बना रहा था, प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं, ”मुझे इसके बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं है. लेकिन नेपाल के संविधान में क्या होगा और क्या नहीं होगा, यह तो नेपाल के लोग ही तय करेंगे. हमारे नेता, संसद और नेपाल की जनता को तय करना था कि हम सेक्युलर देश बनें या ना बनें. यह किसी के दबाव से संभव नहीं होता. मुझे नहीं लगता है कि कोई दबाव था. लेकिन कोई दबाव था भी तो वो उनकी निजी राय हो सकती है. नेपाल तो अपना फ़ैसला ख़ुद ही करेगा न? नेपाल के बारे में कोई और फ़ैसला तो कर नहीं सकता. 2015 में हमारे लिए बहुत ही विकट स्थिति थी. नेपाल में संविधान लागू करने की प्रक्रिया चल रही थी और कुछ मसले भी थे. इसी दौरान भारत की तरफ़ से नाकाबंदी हुई. समस्याएँ बढ़ीं. लेकिन बाद में दोनों देशों ने इस परिस्थिति की समीक्षा की. इससे सबक़ लिया और आगे बढ़ने का फ़ैसला किया.”

भारत नेपाल के बीच अब गौतम बुद्ध को लेकर क्यों हुआ विवाद?
भारत नेपाल सीमा विवाद
भारत का सीमा विवाद अब तक मुखर रूप से चीन और पाकिस्तान के साथ था. सीमा विवाद को लेकर ही दोनों मुल्कों से भारत की जंग भी हो चुकी है.

लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल में नेपाल के साथ भी सीमा विवाद उसकी आक्रामकता से उभरकर सामने आया. इसी साल आठ मई को भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने धारचुला से चीन की सीमा लिपुलेख तक एक सड़क का उद्घाटन किया था. नेपाल का दावा है कि सड़क उसके क्षेत्र से होकर गई है.

अभी यह इलाक़ा भारत के नियंत्रण में है. इससे पहले पिछले साल नवंबर महीने में भारत ने जम्मू-कश्मीर के विभाजन के बाद अपने राजनीतिक मानचित्र को अपडेट किया था, जिसमें लिपुलेख और कालापानी भी शामिल थे. नेपाल ने इसे लेकर कड़ी आपत्ति जताई और जवाब में अपना भी नया राजनीतिक नक़्शा जारी किया.

नेपाल ने लिपुलेख और कालापानी को नेपाल में दिखाया. नेपाल के रक्षा मंत्री ईश्वर पोखरेल ने राइजिंग नेपाल को दिए इंटरव्यू में यहाँ तक कह दिया कि अगर ज़रूरत पड़ी तो नेपाल की सेना लड़ने के लिए तैयार है.

कालापानी में इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस की भी तैनाती है. पूरे विवाद पर भारत के सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे ने कहा था कि नेपाल सरहद पर चीन की शह में काल्पनिक दावा कर रहा है.

‘राम का जन्म नेपाल में हुआ’, कहकर घिरे नेपाल के पीएम?
पाकिस्तान की तरह ही सीमा विवाद?
जैसे पाकिस्तान कहता है कि कश्मीर का मुद्दा सुलझाए बिना भारत के साथ रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते, क्या उसी तरह से अब नेपाल को भी लगता है कि कालापानी और लिपुलेख का विवाद सुलझाए बिना नेपाल-भारत के रिश्तों से कड़वाहट नहीं जाएगी?

इस पर नेपाल के विदेश मंत्री कहते हैं, “देखिए, नेपाल और भारत के बीच जो सीमा विवाद है, उसे तो सुलझाना ही होगा. जब तक ये सुलझ नहीं जाता है, तब तक हमें ये मुद्दा परेशान करता रहेगा. इस समाधान के बिना संबंध अविश्वास और समस्या रहित नहीं बन सकता. इतिहास के अनसुलझे सवाल जो हमें विरासत में मिले हैं, उन्हें बातचीत के ज़रिए सुलझाना ही होगा.”

”लेकिन हम ये भी नहीं चाहते कि इसकी वजह से सब कुछ रुका रहे. भारत के साथ हमारा कई मोर्चों पर संबंध है और हमारी कोशिश यही है कि इन संबंधों को पटरी पर रखते हुए सीमा विवाद का हल निकालें. नेपाल के लिए लिपुलेख और कालापानी का मुद्दा काफ़ी अहम है, क्योंकि यह हमारी संप्रभुता और अखंडता से जुड़ा है. नेपाल के लोगों के लिए भी यह बहुत अहम मसला है. इसलिए इसे तो हर हाल में सुलझाना ही होगा. इसके लिए हमें ऐतिहासिक संधियों, दस्तावेज़ों और प्रमाणों को आधार बनाना होगा.”

सीमा पर गोलीबारी के बाद भारत-नेपाल को बातचीत करनी चाहिए?

चीन और भारत के बीच टकराव से चिंता में पड़ा नेपाल

नेपाल के साथ सीमा विवाद कितना गंभीर?
सीमा विवाद को लेकर भारत चीन से बात कर रहा है. 15 जून को पूर्वी लद्दाख में चीनी सैनिकों के साथ झड़प में भारत के 20 सैनिकों की मौत हुई थी. अब भी चीन के सैनिक एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) के उन इलाक़ों में हैं, जिन पर भारत को आपत्ति है.

नेपाल का कहना है कि भारत पाकिस्तान और चीन के साथ सीमा विवाद को लेकर संवाद कर सकता है

लेकिन भारत का कहना है कि इस मसले को बातचीत से सुलझाया जाएगा. पाकिस्तान के साथ भी कश्मीर को लेकर दोनों देशों में बातचीत होती रही है. नेपाल का कहना है कि भारत पाकिस्तान और चीन के साथ सीमा विवाद को लेकर संवाद कर सकता है, तो नेपाल से करने में क्यों हिचक रहा है?

क्या भारत नेपाल से सीमा विवाद को गंभीरता से नहीं ले रहा है? नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली भी मानते हैं कि भारत इस अहम मुद्दे की उपेक्षा कर रहा है, जबकि नेपाल के लिए ये पर्दा डालने वाला मुद्दा नहीं है.

प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं, ”नेपाल लंबे वक़्त से इस समस्या का समाधान बातचीत के ज़रिए करने की कोशिश कर रहा है. विदेश सचिव स्तर की बातचीत शुरू करने के लिए हमने प्रस्ताव भी रखा. ऐसा कई बार किया. मुझे नहीं पता कि भारत इस मुद्दे को लेकर संवेदनशील क्यों नहीं है. बल्कि भारत इसे नज़रअंदाज़ कर रहा है. एक और अहम बात है कि दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने 2016 में आपसी संबंधों को 21वीं सदी के हिसाब से अपग्रेड करने के लिए एक ग्रुप का गठन किया था. दो साल पहले उस समूह ने अपनी रिपोर्ट तैयार की थी लेकिन अब तक भारत की तरफ़ से उस पर कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आई है.”

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के एक बयान पर भड़के अयोध्या के संत?

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के एक बयान पर भड़के अयोध्या के संत?
भारत ने सरकार गिराने की कोशिश की?
भारत और नेपाल में जारी तनाव के बीच नेपाल की केपी शर्मा ओली सरकार संकट में आ गई थी. सत्ताधारी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में दो वरिष्ठ नेताओं पुष्प कमल दहाल प्रचंड और प्रधानमंत्री ओली के बीच विवाद इतना बढ़ा कि प्रधानमंत्री से इस्तीफ़े की माँग होने लगी.

ये भी कहा गया कि ओली अपनी घटती लोकप्रियता छुपाने के लिए भारत विरोधी क़दम उठा रहे हैं. इन विवादों के बीच ही प्रधानमंत्री ओली ने आरोप लगाया था कि उन्हें पीएम की कुर्सी से हटाने की साज़िश दिल्ली में और काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास में चल रही है? क्या वाक़ई भारत ओली को पीएम से हटाने की साज़िश में शामिल था?

नेपाल की विदेश नीति क्या होगी और हम किससे संबंध रखेंगे. नेपाल की विदेश नीति कोई दूसरा या तीसरा देश तय नहीं कर सकता है.

नेपाल के विदेश मंत्री कहते हैं, ”मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री ओली भारत से होने वाली न्यूज़ कवरेज की बात कर रहे थे. जिस तरह की न्यूज़ कवरेज हो रही थी, वो बहुत अपमानजनक थी. किसी भी देश के आंतरिक मामलों में या वहाँ की सरकार में आए तात्कालिक संकट को लेकर ऐसी बातें कैसे की जा सकती हैं? जिस तरह की बातें की जा रही थीं, वो बहुत ही आपत्तिजनक थीं. दूसरे देश की मीडिया या वहाँ के कथित बुद्धिजीवी वर्ग यह तय नहीं करेंगे कि नेपाल की विदेश नीति क्या होगी और हम किससे संबंध रखेंगे. नेपाल की विदेश नीति कोई दूसरा या तीसरा देश तय नहीं कर सकता है.”

भारत पर नेपाल के इन आरोपों की क्या वजह है?
भारत को नेपाल ब्लैकमेल करता है?
नेपाल और भारत संबंधों में दोस्ती या कड़वाहट की बात आती है, तो चीन का ज़िक्र ज़रूर होता है. नेपाल तीन तरफ़ से भारत से घिरा हुआ और एक तरफ़ से तिब्बत से सीमा लगती है.

ज़ाहिर है कि तिब्बत अब चीन के ही नियंत्रण में है. इस लिहाज़ से नेपाल एक लैंडलॉक्ड देश है. भारत से संबंध बिगड़ने पर नेपाल को अतीत में नाकाबंदी का भी सामना करना पड़ा है. ऐसी नाकाबंदी से नेपाल में मानवीय संकट पैदा हो जाता है, क्योंकि खाने-पीने के ज़रूरी सामानों की भी क़िल्लत हो जाती है.

ऐसे में नेपाल चाहता है कि वो भारत पर निर्भर नहीं रहे. इसके लिए ज़रूरी है कि वो चीन से भी ट्रांजिट सेवा को सुगम बनाए. नेपाल और चीन ने पिछले कई सालों में इसे विकसित भी किया है. दूसरी तरफ़ भारत और चीन के रिश्ते ठीक नहीं रहते.

ऐसे में भारत को लगता है कि नेपाल और चीन की बढ़ती नज़दीकी उसके लिए ख़तरनाक हो सकती है. चीन के लिए नेपाल बहुत छोटा और ग़रीब मुल्क है. उसके बावजूद चीन द्विपक्षीय संबंधों में नेपाल को काफ़ी प्राथमिकता देता है.

भारत को लगता है कि यह तवज्जो उसके ख़िलाफ़ है. पिछले साल अक्तूबर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत के दौरे पर आए, तो वो नेपाल भी गए थे.

भारत को लगता है कि यह तवज्जो उसके ख़िलाफ़ है. पिछले साल अक्तूबर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत के दौरे पर आए, तो वो नेपाल भी गए थे.

कई लोग कहते हैं कि नेपाल भारत को ब्लैकमेल करने के लिए चीन का इस्तेमाल करता है. कुछ लोग यह भी कहते हैं कि नेपाल लैंडलॉक्ड देश है और इसका फ़ायदा भारत उठाता है. दोनों में कितनी सच्चाई है?
प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं, ”यह बिल्कुल सच बात है कि नेपाल लैंडलॉक्ड देश है. यह एक तथ्य है कि लैंडलॉक्ड देश को उसकी क़ीमत चुकानी पड़ती है. ऐसे देशों का ट्रांजिट ट्रांसपोर्टेशन महँगा होता है. ऐसे में उत्पादन लागत ज़्यादा लगती है. विश्व बाज़ार की प्रतिस्पर्धा में वैसे देशों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. इसीलिए ट्रांजिट सुविधा हमारे लिए प्राथमिकता है. ये लैंडलॉक्ड देश का अधिकार भी होता है.”

“हम नहीं चाहते कि अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण पीछे रह जाएँ. हम यह भी चाहते हैं कि किसी एक मुल्क पर निर्भर ना रहें. हम पारस्परिक निर्भरता के पक्ष में हैं. इसीलिए हम कोशिश कर रहे हैं कि नेपाल की ट्रांजिट सुविधा में विविधता और विस्तार हो. भारत के माध्यम से हम इस सुविधा का इस्तेमाल करते रहे हैं. हम अब चीन के साथ ट्रांजिट सुविधा बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. यह नेपाल की राष्ट्रीय ज़रूरत है. मुझे नहीं लगता कि इस मामले में कोई देश अनुचित लाभ लेना चाहता है. हम भारत और चीन दोनों के साथ विकास यात्रा में जुड़कर आगे बढ़ना चाहते हैं. पड़ोसी देशों में हो रहे विकास और समृद्धि को हम अपने लिए एक अवसर की तरह देखते हैं. मुझे लगता है कि हमारे पड़ोसियों को भी यह समझना चाहिए कि एक समृद्ध नेपाल उनके हित में है.”

भारतीय सेना से क्या गोरखाओं को वापस बुलाएगा नेपाल?


15 मई को भारत के आर्मी प्रमुख जनरल नरवणे ने एक ऑनलाइन सेमिनार में कहा था, ”लिपुलेख पास पर लिंक रोड निर्माण को लेकर नेपाल की आपत्ति किसी और की शह पर है. इसके पर्याप्त कारण हैं, जिनसे समझा जा सकता है कि नेपाल किसी और की शह पर आपत्ति जता रहा है. ज़ाहिर है वो शह चीन की है.”

भारत के सेना प्रमुख के इस बयान पर नेपाल में कड़ी प्रतिक्रिया जताई गई. नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने संसद में भारत को आड़े हाथों लिया. उन्होंने नेपाल में कोविड-19 के लिए भी भारत पर हमला बोला.

ऐतिहासिक रूप से भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की अहमियत रही है. नेपाली गोरखा ब्रिटिश इंडिया से ही भारतीय सेना में हैं. गोरखाओं ने गोरखा-सिख, एंग्लो-सिख और अफ़ग़ान युद्ध में अहम भूमिका निभाई थी.

इसके अलावा 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी गोरखाओं का योगदान महत्वपूर्ण रहा. ऐसे में जनरल नरवणे के बयान को लेकर नेपाल के रक्षा मंत्री ईश्वर पोखरेल ने कड़ा ऐतराज़ जताते हुए 25 मई को कहा था, ”भारतीय सेना प्रमुख जनरल नरवणे के बयान से नेपाली गोरखा दुखी हुए हैं. भारत के लिए गोरखाओं के बलिदान की पुरानी परंपरा रही है. अभी भारतीय सेना में 40 गोरखा रेजिमेंट हैं, ये प्रमुख रूप से नेपाली सेना के हैं.”

भारतीय सेना में गोरखाओं की एंट्री 1816 में एंग्लो-नेपाली वॉर के बाद हुई सुगौली संधि से जुड़ी है. तब भारत अंग्रेज़ों का ग़ुलाम था और गोरखाओं ने ब्रिटिश हुकूमत को कड़ी चुनौती दी थी.

हालाँकि एंग्लो-नेपाली वॉर में गोरखाओं की हार हुई थी, लेकिन उन्होंने बहुत ही बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी. अंग्रेज़ों को अहसास हो गया था कि गोरखा बहुत ही बहादुर हैं और आख़िरी साँस तक वीरता से लड़ते हैं. इसी संधि के बाद भारतीय सेना में गोरखा रेजिमेंट की शुरुआत होती है.

जब भारत आज़ाद हुआ तो नेपाल, भारत और ब्रिटेन के त्रिपक्षीय क़रार में छह गोरखा रेजिमेंट्स भारतीय सेना के हवाले किए गए. सातवाँ रेजिमेंट आज़ादी के बाद शामिल हुआ.

जब भारत आज़ाद हुआ तो नेपाल, भारत और ब्रिटेन के त्रिपक्षीय क़रार में छह गोरखा रेजिमेंट्स भारतीय सेना के हवाले किए गए. सातवाँ रेजिमेंट आज़ादी के बाद शामिल हुआ. वर्तमान में सात गोरखा रेजिमेंट के 40 बटालियन में क़रीब 32 हज़ार गोरखा हैं.

क्या भारत और नेपाल के बीच विवाद सिर्फ़ 10 गज ज़मीन का है?
क्या नेपाल भारत से बढ़ते तनाव के बीच गोरखाओं के भारतीय सेना में होने को लेकर कोई अहम फ़ैसला कर सकता है?
इस पर प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं, ”गोरखा का मुद्दा दोनों देशों के बीच एक संवेदनशील मसला है. अभी हम इस मुद्दे पर बहुत विस्तार से कुछ बताने की स्थिति में नहीं हैं. दोनों देशों की साझी संस्कृति है और जिसकी जड़ें बहुत मज़बूत हैं. दोनों मुल्कों के बीच कई ऐसे जटिल मुद्दे हैं, जिन्हें लेकर विवाद है लेकिन बातचीत के ज़रिए सुलझाने की कोशिश की जा रही है.”

मोदी सरकार और नेपाल
2014 में भारत में सत्ता परिवर्तन हुआ तो और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ आई तो उम्मीद की गई कि नेपाल के साथ रिश्ते और मधुर होंगे.

पीएम मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में नेपाल का तीन दौरा कर संबंधों में जोश भरने की कोशिश भी की. लेकिन नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के एक साल बाद ही यानी 2015 में अघोषित नाकाबंदी शुरू हो गई.

इससे नेपाल को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा और संबंध पटरी से उतरते गए. नेपाल में अप्रैल 2015 में भयावह भूकंप आया और कुछ ही महीने बाद नाकाबंदी शुरू हो गई.

नेपाल के लिए यह बहुत मुश्किल भरा दौर रहा. भूकंप के दौरान भारत की मदद को लेकर ट्विटर पर गो बैक इंडिया ट्रेंड करने लगा था.

तो क्या मोदी सरकार में नेपाल से संबंध पटरी से उतरे हैं?
नेपाल के विदेश मंत्री कहते हैं, ”इसके दो पक्ष हैं. कई मोर्चों पर ठीक काम हुए हैं. इंफ़्रास्ट्रक्चर को लेकर कई स्तर पर काम हुए हैं. भारत ने भूकंप के बाद पुनर्निमाण में मदद की. इसके अलावा पेट्रोलियम पाइपलाइन को लेकर भी काम हुआ है. कई मसलों पर जटिलता भी आई है. ख़ासकर सीमा विवाद के मसले पर. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ही नाकाबंदी भी हुई.”


चीन से भारत की दुश्मनी और नेपाल की दोस्ती?
भारत-चीन सरहद पर काफ़ी तनाव है. 31 अगस्त को भारत की सेना ने एक बयान जारी करके कहा कि पूर्वी लद्दाख में चीनी सैनिकों को भारतीय सैनिकों ने तब पीछे धकेल दिया, जब वो 30 अगस्त की रात सीमा पर यथास्थिति बदलने की कोशिश कर रहे थे.

इससे पहले 15 जून को दोनों देशों के सैनिकों में झड़प हुई थी, जिसमें भारत के 20 सैनिकों की मौत हो गई थी. चीन ने आधिकारिक रूप से अपने सैनिकों के हताहत होने के बारे में कुछ नहीं कहा है.

इस मामले में नेपाल पर सवाल उठने लगा कि एक तरफ़ वहाँ के गोरखा भारत की सीमा की सुरक्षा कर रहे हैं और दूसरी तरफ़ वहाँ की सरकार चीन से दोस्ती बढ़ा रही है. नेपाल को लेकर यह शिकायत भी की गई कि उसने कोई कड़ा बयान नहीं जारी किया.

प्रदीप ज्ञवाली इस शिकायत को लेकर कहते हैं, ”हम चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच हर तरह के विवाद का निपटारा द्विपक्षीय बातचीत के ज़रिए हो और यही इलाक़े की शांति और स्थिरता के हक़ में है. हम किसी भी तरह का टकराव नहीं चाहते हैं. नेपाल चाहता है कि उसके दोनों पड़ोसी चीन और भारत आपस में मिलकर रहें और यहीं नेपाल के भी हक़ में है. गलवान घाटी में भारत और चीनी सैनिकों की झड़प के बाद नेपाल ने प्रेस विज्ञप्ति के ज़रिए अपनी स्थिति स्पष्ट की थी.”

भारत-नेपाल के बीच ‘नक्शे’ की दरार
भारत का पूर्वाग्रह?
नेपाल और भारत के रिश्तों को क़रीब से देखने और समझने वाले बताते हैं कि भारत और ज़्यादातर भारतीय नेपाल को एक संप्रभु देश की तरह नहीं देख पाते हैं.

नेपाल की राजनीति पर कई किताब लिख चुके आनंद स्वरूप वर्मा भी मानते हैं कि नेपाल को लेकर भारत की राजनीति में समझ बहुत कम रही है.

वो दोनों देशों के रिश्ते में कुछ संधियों को भी असंतुलित मानते हैं. आनंद स्वरूप वर्मा कहते हैं, ”1950 में भारत ने जो नेपाल से पीस एंड फ्रेंडशिप संधि की थी उसे लेकर नेपाल में अब आवाज़ उठ रही है. वो संधि तब हुई थी जब नेपाल में राणाशाही थी. अगर लोकतांत्रिक नेपाल आपसे इस संधि पर बातचीत करना चाहता है तो आपको करनी होगी.”
भारतीय मीडिया की रिपोर्टिंग को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं. हाल ही में पीएम ओली को लेकर भारत की मुख्यधारा की मीडिया में चीनी राजदूत होउ यांकी के संबंधों को लेकर बॉलीवुड गॉसिप की तरह स्टोरी चलाई गई. इसे लेकर नेपाल ने कड़ी आपत्ति जताई थी.

इन तमाम मुद्दों पर नेपाल के विदेश मंत्री कहते हैं, ”मीडिया के लिए विश्वसनीयता सबसे अहम चीज़ होती है. एक बार जब मीडिया से पाठकों और दर्शकों का भरोसा उठ जाता है तो उसे वापस हासिल करना मुमकिन नहीं होता. भले इसके लिए जितना ज़ोर लगा लें. इसीलिए मीडिया को तथ्यों पर बात करनी चाहिए न कि मनगढ़ंत कहानियों पर. भारत के कुछ मीडिया घरानों ने पीएम ओली और नेपाल में चीन की राजदूत के बारे में कई आपत्तिजनक चीज़ें दिखाईं, जो बहुत ही अपमानजनक था. हम चाहते हैं कि मीडिया प्रोफ़ेशनल ईमानदारी से काम करे और साख पर सवाल नहीं खड़ा हो. कुछ साल पहले भारतीय मीडिया पर हिन्दी में पीपली लाइव नाम की एक फ़िल्म बनी थी. मैं चाहूंगा कि पीपली लाइव-2 न बनाना पड़े.”

ज्ञवाली आगे कहते हैं, ”नेपाल अपने सभी पड़ोसियों समेत सभी मित्र देशों से सार्वभौमिक समानता के आधार पर संबंधों को आगे बढ़ाना चाहता है. संभव है कोई देश दूसरे देश से कई मामलों में कम हो. यह आर्थिक स्तर पर हो सकता है, आकार के स्तर पर हो सकता है लेकिन संप्रभुता सबके लिए एक होती है और सबको उतना ही हक़ होता है कि वो अपनी संप्रभुता के लिए काम करे और उसकी रक्षा करे. नेपाल की विदेश नीति में संप्रभुता का सम्मान और बराबरी का संबंध सबसे अहम है.”

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भारत का रिप्लेसमेंट
तो क्या नेपाल भारत की भूमिका को कम करना चाहता है?

प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं, ”यहाँ मसला भूमिका कम करने का नहीं है. भारत के साथ हमारा बहुमुखी संबंध है. हम किसी एक देश के संबंध की तुलना किसी दूसरे देश के संबंध से नहीं करते. सबके साथ बिल्कुल स्वतंत्र संबंध हैं. नेपाल भारत के साथ और मज़बूत संबंध बनाना चाहता है. हम भारत के साथ मज़बूत आर्थिक संबंध के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं और इसमें हमें कामयाबी भी मिली है. भारत के साथ हमारे कई अनसुलझे मसले हैं. सीमा विवाद है और इसके अलावा कुछ ऐसी संधियाँ हैं, जिनके कई प्रावधान एकतरफ़ा हैं. हम चाहते हैं कि भारत के साथ बराबरी का पारस्परिक संबंध हो. ऐसा संबंध जो विश्वास पर आधारित हो, जिसमें उतार-चढ़ाव न हो और जिसमें दोनों देशों के हित निहित हों.”

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