पूंजी ही नहीं ज्ञान का इतिहास रक्त-रंजित है... भी

पूंजी ही नहीं ज्ञान का इतिहास रक्त-रंजित है… भी

पूंजी ही नहीं ज्ञान का इतिहास रक्त-रंजित है…
भी
यदि आपको यह पता चले कि मेडिकल की पढ़ाई के दौरान जिस कंकाल (Skelton) की मदद से आपको पढ़ाया जा रहा है वह उस बच्ची का कंकाल है, जिसका एक प्यारा सा नाम था और जिसे कुछ अन्य लोगो के साथ महज कुछ दशक पहले ही राज्य की पुलिस ने बम से उड़ा दिया था, क्योंकि वे काले थे और अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे थे, तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी?
कोविड-19 के दौरान इसी फरवरी में अमेरिका की पेंसिल्वेनिया (Pennsylvania) यूनिवर्सिटी में फोरेंसिक एंथ्रोपोलॉजी (forensic anthropology) के ऑनलाइन कोर्स के दौरान यही हुआ। पढ़ाने के लिए जिन हड्डियों का इस्तेमाल किया जा रहा था, उसके बारे में टीचर ने कहा कि यह अभी भी ‘जूसी’ (juicy) है।
इसके खिलाफ छात्रों और ब्लैक अधिकारों से जुड़े संगठनों की तरफ से हुए प्रदर्शनों के बाद यह जानकारी आयी कि यह ‘ट्री अफ्रीका’ (‘मूव’ आंदोलन से जुड़ा हर व्यक्ति अपना सर नेम ‘अफ्रीका’ रखता था) नाम की उस बच्ची के कंकाल की हड्डी थी जिसके माता-पिता काले लोगो के एक आंदोलन ‘मूव’ (MOVE) से जुड़े हुए थे। ‘ब्लैक पैंथर’ आंदोलन के खत्म होने के बाद यह आंदोलन अस्तित्व में आया था।
13 मई 1985 को अमेरिका के फिलाडेल्फिया स्थित उनके हेडक्वार्टर को करीब 500 पुलिसकर्मियों ने घेर लिया। बिजली पानी काटकर उन्हें समर्पण के लिए बाध्य किया गया। लेकिन जब ‘मूव’ सदस्यों ने समर्पण करने से इंकार कर दिया तो उनके घर (जो ‘मूव’ का हेडक्वॉर्टर भी था) को हेलीकॉप्टर से बम गिराकर नेस्तनाबूद कर दिया गया। इसमे कुल 13 लोग मारे गए, जिसमे 5 बच्चे थे। बाद में इनकी अस्थियों (Remains) को राज्य ने उनके परिवार वालों को न देकर खुद जब्त कर लिया और बाद में उसे प्रसिद्ध फिलाडेल्फिया स्थित ‘पेन म्यूज़ियम’ (The Penn Museum) को सौप दिया । जहाँ से उनका इस्तेमाल गोरे लोगो को ‘शिक्षित’ करने में किया जाता रहा। काले लोगो के न ही जीवन का सम्मान किया जाता है और न ही उनकी मौत का। उनकी मौत के बाद भी उनका शोषण जारी रहता है। मौत के बाद उनकी अस्थियां भी म्यूज़ियम में कैद रहती हैं। इस पूरे घटनाक्रम पर एक बहुत ही अच्छी डाक्यूमेंट्री देखी जा सकती है -‘Let the Fire Burn’
पेन म्यूज़ियम जैसी दुनिया के तमाम म्यूज़ियम में जो हजारों की संख्या में कंकाल और हड्डियां रखी हुई हैं, वे सब गुलामों और कालों की हड्डियां और कंकाल हैं, जो आज भी अपनी सम्मानजनक विदाई का इंतजार कर रही हैं। ये म्यूज़ियम हमें मानव विकास के निर्दोष इतिहास की नहीं बल्कि बर्बर इतिहास की जानकारी देते हैं। इस विषय पर एक महत्वपूर्ण किताब ‘बोन रूम्स’ (Bone Rooms: From Scientific Racism to Human Prehistory in Museums) के माध्यम से आप इतिहास के इस तहखाने की एक दुखदाई यात्रा कर सकते हैं।
अभी 1 जून को कनाडा में वहां के मूल निवासियों के जिन 215 बच्चो के कंकाल मिले है, उन्हें उनके मां बाप से छीनकर एक केथोलिक होस्टल में रखा गया था ताकि उन्हें ‘सभ्य नागरिक’ बनाया जा सके। यहां इन बच्चो पर ‘कैलोरी-प्रयोग’ (calorie experiment) भी किया जा रहा था। जिसके तहत उन्हें बहुत कम भोजन दिया जा रहा था। इसी कारण उन बच्चो की मौत हुई। आज हमें कैलोरी के बारे में जो भी जानकारी है, उसके पीछे इन मासूमों की मौत को हमे नहीं भूलना चाहिए।
1994 में जब नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बने तो उन्होंने फ्रांस से ‘बार्टमन’ (Baartman) नामक अफ्रीकी महिला की अस्थियां लौटाने को कहा जो फ्रांस के एक म्यूजियम में पिछले 150 सालों से कैद थी और वहाँ भी गोरे लोगों को ‘शिक्षित’ करने का साधन थी। नेल्सन मंडेला के इस आग्रह के बाद बहुत ना नुकुर के बाद 2002 में ‘बार्टमन’ की अस्थियों को वापस उनके देश दक्षिण अफ्रीका भेजा गया और ‘बार्टमन’ के जन्म के 200 सालों बाद उन्हें सम्मानपूर्वक दफनाया जा सका। इस घटना के बाद ही लोगों को इतिहास के इस भयावह पक्ष के बारे में थोड़ी जानकारी मिली।
अमेरिका में तो मेडिकल साइन्स का विकास और भी भयानक है। रात के अंधेरे में चोरी से कब्र से काले लोगों का मृत शरीर निकाल कर उसे चीर कर अध्ययन किया जाता था। क्योंकि गोरे लोगों का शव निकालना तो असंभव था। इसे महापाप माना जाता था।
आधुनिक गायनोकॉलोजी (gynecology) तो पूरी तरह गुलाम काली महिलाओं के शरीर पर हुए क्रूर प्रयोगों पर आधारित है। बड़े बड़े प्रायोगिक सर्जिकल ऑपरेशन बिना एनस्थीसिया के गुलाम-काली महिलाओं को चेन से बांधकर किया जाता था।
1932-72 के बीच काले अफ्रीकी लोगों पर किये गए ‘Tuskegee Syphilis Study’ को कौन भूल सकता है, जिसमे सिफलिस नामक भयंकर बीमारी से पीड़ित मरीजों का इलाज न करके उन्हें लगातार तड़पाया जाता था, ताकि बीमारी के विकास के हर चरण का अवलोकन किया जा सके। लेकिन अफसोस कि सिफलिस से पीड़ित काले लोगों को लगता था कि उनका इलाज किया जा रहा है।
सच में तमाम दवा कंपनियों ने अपनी दवाओं के एक्सपेरिमेंट के लिए कितने काले, अफ्रीकी, एशियाई लोगों की जान ली है, यह इतिहास का एक भयावह पक्ष है, जिस पर अभी बहुत कम बात हुई है। ‘हैरिएट ए वाशिंगटन’ (Harriet A. Washington) की मशहूर किताब ‘मेडिकल अपार्थाइड’ (Medical Apartheid) में हमे जरूर इसकी एक झलक मिलती है।
जिस तरह दुनिया की तमाम दौलत और चकाचौंध हमारे खून-पसीने से है, ठीक उसी तरह दुनिया का तमाम ज्ञान -विज्ञान भी हमारे ही खून-पसीने से सींचा गया है।
यही दुनिया का सबसे बड़ा और अटल ज्ञान है।

#मनीष आज़ाद

Amita Sheereen

B kumar Arihant
Author: B kumar Arihant

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