आरएसएस संघ का खुनी इतिहास ! समय निकाल कर जरूर पढ़ें संघ का खूनी इतिहास

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आरएसएस संघ का खुनी इतिहास.. समय निकाल कर जरूर पड़े
संघ का खूनी इतिहास :-
( पोस्ट थोड़ा लम्बा है पर सच जानने के लिए अवश्य पढ़ें?)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक विद्वान विचारक हैं राकेश सिन्हा जी , वह “संघ के विशेषज्ञ” के नाम से लगभग हर टीवी चैनल पर बहस करते रहते हैं और संघ के काले को सफेद करते रहते हैं ।कुछ दिन से हर टीवी डिबेट में यह बता रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक कोई आज का पैदा नहीं है बल्कि 1925 का जन्म लिया अनुभवी संगठन है । सोचा संघ के 90 वर्ष के जीवन का पोस्टमार्टम किया जाए ।

1925 कहने का तात्पर्य सिन्हा जी या अन्य संघ के विद्वानों का इसलिए है कि उसी समय इनके एक योद्धा “सावरकर” ने एक संगठन बनाया था जिसका संघ से कोई लेना देना नहीं था सिवाय इसके कि संघ को सावरकर से जहर फैलाने का सूत्र मिला । सावरकर पहले कांग्रेस में थे परन्तु आजादी की लड़ाई में अंग्रेज़ो ने पकड़ कर इनको “आजीवन कैद” की सज़ा दी और इनको “कालापानी” भेजा गया जो आज पोर्ट ब्लेयर( काला पानी) के नाम से जाना जाता है ।संघ के लोगों से अब “वीर” का खिताब पाए सावरकर  कुछ वर्षों में ही अंग्रेज़ों के सामने गिड़गिड़ाने लगे और अंग्रेजों से माफी मांग कर अंग्रेजों की इस शर्त पर रिहा हुए कि स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहेंगे और अग्रेजी हुकूमत की वफादारी अदा करते उन्होंने कहा कि ” हिन्दुओं को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की बजाए अपनी शक्ति देश के अंदर मुसलमानों और इसाईयों से लड़ने के लिए लगानी चाहिए” ध्यान दीजिये कि तब पूरे देश का हिन्दू मुस्लिम सिख एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर आजादी के लिए मर रहा था शहीद हो रहा था और तब ना कोई यह सोच रहा था कि हिन्दू मुस्लिम अलग भी हो सकते हैं , तब यह “वीर” देश में आग लगाने की बीज बो रहे थे , जेल से सशर्त रिहा हुए यह वीर देश की आपसी एकता के विरूद्ध तमाम किताबों को लिख कर सावरकर ने अंग्रेजों को दिये 6 माफीनामे की कीमत चुकाई देश के साथ गद्दारी की और आजाद भारत में नफरत फैलाने की बीज बोते रहे ।
1947 में देश आजाद हुआ और देश की स्वाधीनता संग्राम आंदोलन के ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज बनाने का फैसला स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने लिया तो इसी विचार के लोग इसके विरोध में और अंग्रेजों को वफादारी दिखाते राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को जला रहे थे और पैरों से कुचल रहे थे और मौका मिलते ही देश के विभाजन के समय हिन्दू – मुस्लिम दंगों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और मौका मिलते ही देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या कर दी क्युँकि सावरकर हेडगेवार की यह सोच थी कि इस देश में “गाँधी” के रहते उनके उद्देश्य पूरे नहीं होंगे। संघ के जन्मदाता हेडगेवार और गोवलकर ने गाँधी जी की हत्या करने के बाद (सरदार पटेल ने स्वीकार किया ) अपने विष फैलाने की योजना में लग गये , तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू राष्ट्र के निर्माण में लग गये और संघ के लोग भविष्य के भारत को ज़हर से भरने के औज़ार बनाने लगे , नेहरू पटेल को उदारवादी कहिए या उनकी मूक सहमति , संघ को पैदा होते ही उसके देश विरोधी क्रिया

कलाप देख कर भी आंखें मूंदे रहे ।इस बीच संघ ने देश की एकता को तोड़ने के सारे वह साहित्यिक हथियार पुस्तकों के रूप में बना लिए जिससे हिन्दू भाईयों की धार्मिक भावना भड़के जिसका मुख्य आधार मुसलमानों से कटुता और मुगलों के झूठे आत्याचार थे , न्यायिक प्रक्रिया में दंड पाए लोगों को भी हिन्दू के उपर किया अत्याचार किया दिखाया गया , शासकीय आदेशों को तोड़ मरोड़कर हिन्दू भाईयों पर हुए अत्याचार की तरह दिखाया गया तथा इतिहास को तोड़ मरोड़कर मुगल शासकों को अत्याचारी बताया कि हिन्दुओं पर ऐसे ऐसे अत्याचार हुआ और औरंगज़ेब को उस अत्याचार का प्रतीक बनाया गया , एक से एक भड़काने वाली कहानियाँ गढ़ी गईं और इसी आधार पर संघी साहित्य लिखा गया पर जिस झूठ को सबसे अधिक फैलाया गया वो था कि ” औरंगज़ेब जब तक 1•5 मन जनेऊ रोज तौल नहीं लेता था भोजन नहीं करता था” अब सोचिएगा जरा कि एक ग्राम का जनेऊ 1•5 मन (60 किलो) कितने लोगों को मारकर आएगा ? 60 हजार हिन्दू प्रतिदिन , दो करोड़ 19 लाख हिन्दू प्रति वर्ष और औरंगज़ेब ने 50 वर्ष देश पर शासन किया तो उस हिसाब से 120 करोड़ हिन्दुओं को मारा बताया गया जो आज भारत की कुल आबादी है और तब की आबादी से 100 गुणा अधिक है ।पर ज़हर सोचने समझने की शक्ति समाप्त कर देती है तो भोले भाले हिन्दू भाई विश्वास करते चले गए ।इन सब हथियारों को तैयार करके संघ अपनी शाखाओं का विस्तार करता रहा और हेडगेवार और गोवलकर एक से एक ब्राह्मणवादी ज़हरीली किताबें लिखते रहे प्रचारित प्रसारित करते रहे जिनका आधार “मनुस्मृति” थी और गोवलकर की पुस्तक “बंच आफ थाट” संघ के लिए गीता बाईबल और कुरान के समकक्ष थी और आज भी है।नेहरू के काल में ही अयोध्या के एक मस्जिद में चोरी से रामलला की मुर्ति रखवा दी गई और उसे बाबर से जोड़ दिया गया जबकि बाबर कभी अयोध्या गये ही नहीं बल्कि वह मस्जिद अयोध्या की आबादी से कई किलोमीटर दूर बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बनवाई थी , ध्यान रहे कि उसके पहले बाबरी मस्जिद कभी विवादित नहीं रही परन्तु नेहरू आंख बंद किये रहे ।नेहरू के बाद इंदिरा गांधी का समयकाल प्रारंभ हुआ और सख्त मिजाज इंदिरा गांधी के सामने यह अपने फन को छुपाकर लुक छिप कर अपने मिशन में लगे रहे और कुछ और झूठी कहानियाँ गढ़ी और अपना लक्ष्य निर्धारित किया  जो “गोमांस , धारा 370 , समान आचार संहिता , श्रीराम , श्रीकृष्ण जन्मभूमि और काशी विश्वनाथ मंदिर , स्वदेशीकरण थे । इंदिरा गांधी ने आपातकाल में जब सभी को जेल में ठूस दिया तो संघ के प्रमुख बाला साहब देवरस , इंदिरा गांधी से माफी मांग कर छूटे और सभी कार्यक्रम छुपकर करते रहे पर इनको फन फैलाने का अवसर मिला इंदिरा गांधी की हत्या के बाद , तमाम साक्ष्य उपलब्ध हैं कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगों में संघ के लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था ।राजीव गांधी बेहद सरल और कोमल स्वभाव के थे और उतने ही विनम्र  , जिसे भाँप कर संघियों ने अपना फन निकालना प्रारंभ किया और हिन्दू भाईयों की भावनाओं का प्रयोग करके श्रीराम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद के विवाद को हवा दे दी और आंदोलन चला दिया , पर पहले नरम अटलबिहारी वाजपेयी को मुखौटे के रूप में आगे किया जिसकी स्विकरोक्ती गोविंदाचार्य ने भी अटलबिहारी वाजपेयी को मुखौटा कह कर की , संघ का दोगलापन उजागर करने की कीमत उनको संघ से बाहर करके की गई और वह आजतक बाहर ही हैं । दूसरी तरफ लालकृष्ण आडवाणी तमाम तैयार हथियारों के सहारे हिन्दू भाईयों को उत्तेजित करते रहे जैसे आज योगी साध्वी  और तोगड़िया करते हैं ।राजीव गांधी के पास संसद में इतनी शक्ति थी कि संघ को कुचल देते तो यह देश के लिए सदैव समाप्त हो जाते परन्तु सीधे साधे राजीव गांधी कुटिल दोस्तों की बातों को मानकर गलत ढुलमुल फैसलों से संघ को खाद पानी देते रहे , कारसेवा और शिलान्यास के नाम पर राजीव गांधी का इस तरह प्रयोग किया गया कि संघ को फायदा हो और संघ की रखैल भाजपा ने उसका खूब फायदा उठाया और दो सीट से 88 सीट जीत गई ।फिर वीपी सिंह की सरकार बनी भाजपा और वाम मोर्चा के समर्थन से तथा संघी जगमोहन को भेजकर काश्मीर में आग लगा दिया गया ।
अब सब हथियार और ज़मीन तैयार हो चुकी थी और प्रधानमंत्री नरसिंह राव का समय काल प्रारंभ हुआ जो खुद संघ के प्रति उदार थे , उड़ीसा में पादरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बच्चों को जलाकर मारने के बाद अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बाद संघ ने इसाईयों के प्रति नफरत फैलाने की नीति छोड़कर सारी शक्तियों को देश के मुसलमानों से नफरत फैलाने में लगा दिया , संघ ने प्रधानमंत्री राव की चुप्पी का फायदा उठाया अपने बनाए झूठे हथियारों से  हिन्दू भाईयों के एक वर्ग की भावनाएँ भड़काई और अपने साथ जोड़ लिया । साजिश की संसद और उच्चतम न्यायालय को धोखा दिया और अपने लम्पटों के माध्यम से बाबरी मस्जिद 6 दिसंबर को गिरा दी ।
इसके बाद अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार  बनी तो सारे जन्म स्थान के मंदिर 370 स्वदेशीकरण सब दफन कर दिया गया और हर छोटे बड़े दंगों में शामिल रहा संघ ने साजिश करके गुजरात में इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार कराया और अपने चरित्र के अनुसार एक नायक बनाया। फिर अपने असली रूप चरित्र और सिद्धांतों के अनुसार उसी असली नायक नरेंद्र मोदी को आगे किया और झूठ और फेकमफाक के आधार पर और आज सत्ता पर कब्जा किया।
संघ की यह सब राजनीति उत्तर भारत के प्रदेशों के लिए थी क्युँकि मुगलों का शासन अधिकतर उत्तर भारत में ही था। दक्षिण के राज्य इस जहर से अछूते थे इसलिए अब वहाँ भी एक मुसलमान शासक को ढूढ लिया गया और देश की आजादी से आजतक 67 वर्षों तक निर्विवाद रूप से सभी भारतीयों के हृदय में सम्मान पा रहे महान देशभक्त टीपू सुल्तान आज उसी प्रकिया से गुजर रहे हैं जिससे पिछले सभी मुगल बादशाह गुजर चुके हैं , मतलब हिन्दुओं के नरसंहारक बनाने की प्रक्रिया।और आज उनकी जयंती पर हुए विरोध में एक यूवक की हत्या भी कर दी गई।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जो जुल्मों और लूट का जो इतिहास प्रमाणित रूप से दुनिया के सामने हैं यह उसकी निंदा भी नहीं करते , इस देश को सबसे अधिक लूटने वाले अंग्रेजों की ये कभी आलोचना नहीं करते जो देश की शान “कोहिनूर” तक लूट ले गये , जनरल डायर की आलोचना और जलियांवाला बाग के शहीदों के लिए इनके आँसू कभी नहीं गिरते , आज संघ के पास शस्त्र सहित कार्यकर्ताओं की फौज है जो शहरों में दहशत फैलाने के लिए सेना की तरह फ्लैगमार्च करते हैं  , संविधान की किस धारा के अनुसार उन्हे यह अधिकार है यह पता नहीं । भारतीय इतिहास में जुल्म जो हुआ वह अंग्रेज़ों ने किया और उससे भी अधिक सदियों से सवर्णों ने किया दलितों और पिछड़ों पर , जब चाहा जिसे चाहा सरेआम नंगा कर दिया जो इन्हे दिखाई नहीं देता क्योंकि इनको जुल्मों से मतलब नहीं आपस में लड़ाकर देश मे जहर फैलाकर सत्ता पाने से है और उसके लिए देश टूट भी जाए तो इनसे मतलब नहीं।
इसी लिये कहता हूँ साजिशें करने मे माहिर संघ को “संघमुक्त भारत” करके ही इस देश का भला हो सकता है 

पहला प्रतिबंध

आरएसएस पर पहला प्रतिबंध पंजाब प्रांत (ब्रिटिश भारत) में 24 जनवरी 1947 को सत्तारूढ़ यूनियनिस्ट पार्टी के प्रमुख मलिक खिजर हयात तिवाना द्वारा लगाया गया था, एक पार्टी जो पंजाब के जमींदारों और जमींदारों के हितों का प्रतिनिधित्व करती थी, जिसमें शामिल थे मुस्लिम, हिंदू और सिख। आरएसएस के साथ-साथ मुस्लिम नेशनल गार्ड को भी प्रतिबंधित कर दिया गया था। [[६] [the the] प्रतिबंध 28 जनवरी 1947 को हटा लिया गया था। [76]

1975 में इंदिरा गांधी सरकार ने भारत में आपातकालीन नियम की घोषणा की, जिससे मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया और प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित किया गया। [114] यह कार्रवाई भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारतीय संसद में चुनाव में गड़बड़ी के आरोप में उसका चुनाव रद्द करने के बाद की गई थी। [११४] लोकतांत्रिक संस्थानों को निलंबित कर दिया गया और गांधीवादी जयप्रकाश नारायण सहित प्रमुख विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि हजारों लोगों को बिना किसी आरोप के हिरासत में लिया गया था। [११५] आरएसएस, जिसे विपक्षी नेताओं के करीबी के रूप में देखा जाता था, और इसके बड़े संगठनात्मक आधार के साथ सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को आयोजित करने की क्षमता देखी गई थी, पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था। [११६]

आरएसएस के तत्कालीन प्रमुख देवरस ने इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर प्रतिबंध हटाने के बदले संगठन के सहयोग को बढ़ाने का वादा किया, जिसमें कहा गया कि आरएसएस का बिहार और गुजरात में आंदोलन से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने विनोबा भावे को आरएसएस और सरकार के बीच मध्यस्थता के लिए मनाने की कोशिश की और संजय गांधी, इंदिरा गांधी के बेटे के कार्यालयों की भी मांग की। [११]] [११]] बाद में, जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, तो आरएसएस के स्वयंसेवकों ने आपातकाल के खिलाफ भूमिगत आंदोलनों का गठन किया। [११ ९] मीडिया में सेंसर किए गए साहित्य को बड़े पैमाने पर प्रकाशित और वितरित किया गया, और आंदोलन के लिए धन एकत्र किया गया। आंदोलन के समन्वय के लिए जेल में और बाहर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच नेटवर्क स्थापित किए गए थे। [१२०] आरएसएस ने दावा किया कि आंदोलन “आरएसएस के हजारों कैडर के दसियों वर्चस्व था, हालांकि अधिक से अधिक युवा भर्ती आ रहे हैं”। अपने उद्देश्यों के बारे में बात करते हुए, RSS ने कहा, “इस समय इसके मंच का एक ही मुद्दा है: लोकतंत्र को भारत वापस लाना”। 1977 में आपातकाल हटा लिया गया था, और परिणामस्वरूप आरएसएस पर प्रतिबंध भी हटा दिया गया था।

कहा जाता है कि आपातकाल ने भारतीय राजनीति में आरएसएस की भूमिका को वैध बना दिया था, जो कि 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संगठन ने हासिल नहीं किया था, जिससे अगले दशक की हिंदुत्ववादी राजनीति के लिए ‘बीज बोना’ पड़ा। । [119]
रिसेप्शन

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कार्यभार संभालने के बाद से ही आरएसएस के प्रति सतर्कता बरती थी। जब गांधी की हत्या के बाद गोलवलकर ने नेहरू को आरएसएस से प्रतिबंध हटाने के लिए लिखा, तो नेहरू ने जवाब दिया कि सरकार के पास इस बात का सबूत है कि आरएसएस की गतिविधियाँ ‘सांप्रदायिक’ होने के कारण ‘राष्ट्र-विरोधी’ थीं। दिसंबर 1947 में प्रांतीय सरकारों के प्रमुखों को लिखे अपने पत्र में, नेहरू ने लिखा था कि “हमारे पास यह दिखाने के लिए बहुत सारे सबूत हैं कि आरएसएस एक संगठन है जो एक निजी सेना की प्रकृति में है और जो निश्चित रूप से सबसे नाज़ी पंक्तियों पर आगे बढ़ रहा है। , संगठन की तकनीकों का अनुसरण करते हुए भी “। [१२२]

भारत के पहले उप प्रधान मंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने जनवरी 1948 की शुरुआत में कहा था कि आरएसएस के कार्यकर्ता “देशभक्त हैं जो अपने देश से प्यार करते हैं”। उन्होंने कांग्रेसियों को आरएसएस से प्यार करने के लिए कहा, बजाय उन्हें ‘क्रश’ करने की कोशिश के। उन्होंने आरएसएस से भी विरोध करने के बजाय कांग्रेस में शामिल होने की अपील की। जाफरलॉट का कहना है कि पटेल के इस रवैये को आरएसएस द्वारा सितंबर 1947 में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में भारतीय प्रशासन द्वारा दी गई सहायता से आंशिक रूप से समझाया जा सकता है, और आरएसएस के प्रति ‘योग्य सहानुभूति ’की उनकी अभिव्यक्ति में कई हिंदू परंपरावादियों के लंबे समय तक झुकाव को प्रतिबिंबित किया गया है। कांग्रेस। हालाँकि, 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या के बाद, पटेल ने यह देखना शुरू कर दिया कि आरएसएस की गतिविधियाँ सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा थीं। [123] [124] 11 सितंबर 1948 को आरएसएस पर प्रतिबंध हटाने के संबंध में गोलवलकर को दिए अपने पत्र में पटेल ने कहा कि हालांकि, आरएसएस ने विभाजन की हिंसा के दौरान जरूरत पड़ने पर हिंदुओं की मदद करने और उनकी रक्षा करने के लिए हिंदू समाज सेवा की, लेकिन उन्होंने भी मुसलमानों को बदला लेने के लिए हमला करना शुरू कर दिया। “निर्दोष पुरुषों, महिलाओं और बच्चों” के खिलाफ गया। उन्होंने कहा कि आरएसएस के भाषण “सांप्रदायिक जहर से भरे हुए” थे, और उस ‘जहर’ के परिणामस्वरूप, उन्होंने टिप्पणी की, भारत को गांधी को खोना पड़ा, यह देखते हुए कि आरएसएस के लोगों ने गांधी की मौत का जश्न मनाया था। पटेल आरएसएस के कामकाज के तरीके से गोपनीयता से भी अवगत थे, और शिकायत की कि इसके सभी प्रांतीय प्रमुख मराठा ब्राह्मण थे। उन्होंने भारत के अंदर अपनी सेना होने के लिए आरएसएस की आलोचना की, जो उन्होंने कहा, “राज्य के लिए एक संभावित खतरा था” इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने यह भी टिप्पणी की: “आरएसएस के सदस्यों ने हिंदू धर्म के रक्षक होने का दावा किया। लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि हिंदू धर्म को उपद्रवियों से नहीं बचाया जाएगा।

भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को आरएसएस की मंजूरी नहीं थी। 1948 में, उन्होंने दिल्ली और अन्य बहुसंख्यक क्षेत्रों में ‘लूट, आगजनी, दंगे और मुसलमानों की हत्या’ करने के लिए आरएसएस की आलोचना की। 14 मई 1948 को गृह मंत्री पटेल को लिखे अपने पत्र में, उन्होंने कहा कि आरएसएस के लोगों ने हिंदू बहुसंख्यक क्षेत्रों में मुसलमानों के रूप में कपड़े पहनने और मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों में मुसलमानों पर हमला करने की योजना बनाई थी। उन्होंने पटेल से हिंदू और मुसलमानों के बीच दुश्मनी पैदा करने के उद्देश्य से आरएसएस के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने को कहा। उन्होंने आरएसएस को एक महाराष्ट्रियन ब्राह्मण आंदोलन कहा, और इसे एक गुप्त संगठन के रूप में देखा जिसने सत्य साधनों और संवैधानिक तरीकों की परवाह किए बिना हिंसा का इस्तेमाल किया और फासीवाद को बढ़ावा दिया। उन्होंने कहा कि RSS “निश्चित रूप से सार्वजनिक शांति के लिए एक खतरा था”। [125]

दूसरा प्रतिबंध और बरी

जनवरी 1948 में आरएसएस के एक पूर्व सदस्य, [23] नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या के बाद, आरएसएस के कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था, और एक संगठन के रूप में आरएसएस पर 4 फरवरी 1948 को प्रतिबंध लगा दिया गया था। गांधी की हत्या निर्धारित की गई थी, और इसकी रिपोर्ट भारत के गृह मंत्रालय द्वारा वर्ष 1970 में प्रकाशित की गई थी। तदनुसार, जस्टिस कपूर आयोग [94] ने कहा कि महात्मा गांधी की हत्या के लिए “आरएसएस जैसे जिम्मेदार नहीं थे” उस संगठन का नाम नहीं लिया जा सकता है जैसे कि उस सबसे शैतानी अपराध के लिए जिम्मेदार होने के नाते, शांति के प्रेरित की हत्या। यह साबित नहीं हुआ है कि वे (आरोपी) आरएसएस के सदस्य थे। “[94]: 165 हालांकि , तत्कालीन भारतीय उप प्रधान मंत्री और गृह मंत्री, सरदार वल्लभभाई पटेल ने टिप्पणी की थी कि “आरएसएस के लोगों ने खुशी व्यक्त की और गांधी की मृत्यु के बाद मिठाई बांटी”। [९ ५]

आरएसएस के नेताओं को भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा साजिश के आरोप से बरी कर दिया गया था। अगस्त 1948 में अपनी रिहाई के बाद, गोलवलकर ने आरएसएस पर प्रतिबंध हटाने के लिए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखा। नेहरू ने जवाब दिया कि यह मामला गृह मंत्री की जिम्मेदारी है, गोलवलकर ने उसी के संबंध में वल्लभाई पटेल से सलाह ली। पटेल ने तब पूर्ण पूर्व शर्त की मांग की कि आरएसएस एक औपचारिक लिखित संविधान को अपनाए [96] और इसे सार्वजनिक करे, जहाँ पटेल ने उम्मीद की थी कि आरएसएस भारत के संविधान के प्रति अपनी निष्ठा रखने के लिए, भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगे को स्वीकार करेगा, परिभाषित करेगा। संगठन के प्रमुख की शक्ति, आंतरिक चुनाव कराने से संगठन को लोकतांत्रिक बनाते हैं, आंदोलन में पूर्व किशोरों को दाखिला देने से पहले उनके माता-पिता को अधिकृत करते हैं, और हिंसा और गोपनीयता का त्याग करते हैं। [97] [९]] [९९] ४२-४ गोलवलकर ने इस मांग के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन चलाया, जिसके दौरान उन्हें फिर से जेल में डाल दिया गया। बाद में, आरएसएस के लिए एक संविधान का मसौदा तैयार किया गया था, जो शुरू में, पटेल की किसी भी मांग को पूरा नहीं करता था। फिर से आंदोलन करने की असफल कोशिश के बाद, अंततः संगठन के प्रमुख और पूर्व-किशोरों के नामांकन के चयन की प्रक्रिया के अपवाद के साथ पटेल की इच्छा के अनुसार आरएसएस के संविधान में संशोधन किया गया। हालाँकि, संगठन का आंतरिक लोकतंत्र जो उसके संविधान में लिखा गया था, एक ‘मृत पत्र’ बना रहा। [१००]

11 जुलाई 1949 को भारत सरकार ने एक विज्ञप्ति जारी करके आरएसएस पर लगे प्रतिबंध को हटाते हुए कहा कि आरएसएस के नेता गोलवलकर को भारत के संविधान के प्रति निष्ठावान बनाने के उपक्रम के मद्देनजर आरएसएस पर प्रतिबंध हटाने का निर्णय लिया गया था। और आरएसएस के संविधान में भारत के राष्ट्रीय ध्वज के प्रति स्वीकृति और सम्मान अधिक स्पष्ट है, जिसे लोकतांत्रिक तरीके से काम किया जाना था। [३] [९९]

भारत के संविधान का विरोध

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने शुरू में भारत के संविधान को मान्यता नहीं दी, इसकी कड़ी आलोचना की क्योंकि भारतीय संविधान ने “मनु के नियमों” का कोई उल्लेख नहीं किया है – प्राचीन हिंदू ग्रंथ मनुस्मृति से। [92] जब संविधान सभा ने संविधान को अंतिम रूप दिया, तो आरएसएस के मुखपत्र, आयोजक ने 30 नवंबर 1949 के संपादकीय में शिकायत की:

लेकिन हमारे संविधान में, प्राचीन भारत में उस अद्वितीय संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है ... आज तक मनुस्मृति में वर्णित उनके कानून दुनिया की प्रशंसा करते हैं और सहज आज्ञाकारिता और अनुरूपता का परिचय देते हैं। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए इसका मतलब कुछ भी नहीं है [50]

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस मुद्दे पर अपने अविश्वसनीय हमलों को नहीं रोका, और बी आर अम्बेडकर के सार्वजनिक घोषणाओं की आलोचना की कि नया संविधान सभी जातियों को समानता देगा। 6 फरवरी 1950 को ऑर्गेनाइजर ने एक अन्य लेख “मनु रूल्स अवर हर्ट्स” शीर्षक से लिखा, उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश जिसका नाम शंकर सुब्बा अय्यर है, ने लिखा कि मनुस्मृति के लिए हिंदुओं के लिए अंतिम कानून बनाने वाले प्राधिकारी के बजाय उनके समर्थन की पुष्टि की, संविधान के बजाय। भारत। यह कहा गया है:

भले ही डॉ। अंबेडकर ने बॉम्बे में हाल ही में कहा है कि मनु के दिन समाप्त हो गए हैं, फिर भी यह एक तथ्य है कि हिंदुओं के दैनिक जीवन आज भी सिद्धांतों और निषेधाज्ञाओं से प्रभावित हैं

मनुस्मृति और अन्य स्मृतिकारों में निहित है। यहां तक कि एक अपरंपरागत हिंदू खुद को कुछ मामलों में कम से कम स्मृति में निहित नियमों से बंधे हुए महसूस करता है और वह पूरी तरह से अपने पालन को छोड़ देने के लिए शक्तिहीन महसूस करता है। [93]

आरएसएस के विरोध, और भारत के खिलाफ विट्रियल हमलों के बाद, भारत के संविधान ने स्वतंत्रता के बाद जारी रखा। 1966 में गोलवलकर ने अपनी किताब में शीर्षक बंच ऑफ थॉट्स डाला:

 हमारा संविधान भी पश्चिमी देशों के विभिन्न संविधानों के विभिन्न लेखों के साथ मिलकर एक बोझिल और विषम piecing है। यह बिल्कुल कुछ भी नहीं है, जिसे हमारा अपना कहा जा सकता है। क्या इसके मार्गदर्शक सिद्धांतों में संदर्भ का एक भी शब्द है कि हमारा राष्ट्रीय मिशन क्या है और जीवन में हमारा मुख्य उद्देश्य क्या है? नहीं!

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