एक बोध कथा
एक बोध कथा

एक बोध कथा

एक बोध कथा
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सांपों के देश में एक ऐसा नेवला पैदा हो गया, जो सांपों से ही क्या, किसी भी जानवर से लड़ना नहीं चाहता था. सारे नेवलों में यह बात फैल गयी. वे कहने लगे, अगर वह किसी और जानवर से लड़ना नहीं चाहे, तो कोई बात नहीं, मगर सांपों से लड़ना और उनका खात्मा करना तो हर नेवले का फर्ज है.

“फर्ज क्यों?” शांतिप्रिय नेवले ने पूछा.

उसका यह पूछना था कि चारों ओर यह चर्चा फैल गयी कि वह न केवल सांपों का हिमायती और नेवलों का दुश्मन है, बल्कि नये ढंग से सोचने वाला और नेवला-जाति की परम्पराओं एवं आदर्शों का विरोधी भी है.

‘वह पागल है.’ उसके पिता ने कहा.

‘वह बीमार है.’ उसकी मां ने कहा.

‘वह बुजदिल है.’ उसके भाइयों ने कहा.

तब तो जिन नेवलों ने कभी उसे देखा नहीं था, उन्होंने भी कहना शुरू कर दिया कि वह सांपों की तरह रेंगता है, और नेवला-जाति को नष्ट कर देना चाहता है.

शांतिप्रिय नेवले ने प्रतिवाद किया- ‘मैं तो शांतिपूर्वक सोचने-समझने की कोशिश कर रहा हूं.’

‘सोचना गद्दारी की निशानी है!’ एक नेवला बोल उठा.

‘सोचना तो हमारे दुश्मनों का काम है’ दूसरा नेवला चिल्लाया.

फिर तो यह भी अफवाह फैल गयी कि सांपों की तरह उस नेवले के भी जहर के दांत हैं. तब उस पर मुकद्दमा चला और बहुमत से उसे देशनिकाले की सजा दे दी गयी.

शिक्षा- जो दुश्मन के हाथों न मारा जाये, वह अपने ही लोगों के हाथों मारा जा सकता है.

– जेम्स थर्बर
(नवनीत में प्रकाशित)

Mahender Kumar
Author: Mahender Kumar

Journalist

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