गांधी अंबेडकर के बीच जो पूनापैक्ट हुआ था , अगर पं. नेहरू नही होते तो लागू हो पाता ? कदापि नही.
गांधी अंबेडकर के बीच जो पूनापैक्ट हुआ था , अगर पं. नेहरू नही होते तो लागू हो पाता ? कदापि नही.

गांधी अंबेडकर के बीच जो पूनापैक्ट हुआ था , अगर पं. नेहरू नही होते तो लागू हो पाता ? कदापि नही.

गांधी अंबेडकर के बीच जो पूनापैक्ट हुआ था , अगर पं. नेहरू नही होते तो लागू हो पाता ? कदापि नही.

आज पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी एससी-एसटी ओबीसी और सामान्य वर्ग चारों के लिए उपेक्षा के पात्र हैं। ऐसा काम ही किया है। जिस तरह भाजपा ने पूंजीवादी पैटर्न पर चलकर शिक्षा को महंगा किया, सरकारी नौकरियों के क्षेत्र को समाप्त किया,पेंशन समाप्त किया, सरकारी विभागों को प्राइवेट किया,उस तरह नेहरू,इंदिरा ने पूंजीवादी पैटर्न पर चलकर शिक्षा को महंगा नहीं किया। सरकारी नौकरियों के स्रोत को समाप्त नहीं किया। पेंशन खत्म नहीं किया। जिससे ढेर सारे शिक्षित और अशिक्षित लोग सरकारी नौकरियों में आये और पेंशन पा रहे हैं। क़ृषि के क्षेत्र में बड़ी क्रांति की। आज ये ही लोग नेहरू इंदिरा से नाराज हैं कि इन्होंने हमारे लिए कुछ नहीं किया।

1950 में चंपकम दोराइराजन बनाम मद्रास राज्य के केस में उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण सिस्टम को ही रद्द कर दिया था। उसने कहा,जब मूल अधिकार और निति निर्देशक तत्वों में टकराव होगा तो मूल अधिकार को वरीयता दी जाएगी। वैसे भी निति निर्देशक तत्वों को लागू न करें तो भी ठीक है। लेकिन मूल अधिकार को बचाना सुप्रीम कोर्ट का एक आवश्यक दायित्व है। आगे यह भी कहा कि मूल अधिकारों का संशोधन संसद द्वारा संशोधन प्रक्रिया के माध्यम से किया जा सकता है। अब देखिए उच्चतम न्यायालय कह रहा है कि निति निर्देशक तत्वों को लागू नहीं भी किया जायेगा तो ठीक है। यानी कमजोर हमेशा कमजोर ही रहें? तो ठीक है? यानी कमजोर का कोई मौलिक अधिकार नहीं। सारा मौलिक अधिकार साधन संपन्न लोगों का है। तब नेहरू ही थे जिसने सोचा,अगर समाज के बंचित तबके को मुख्य धारा में लाना है तो संविधान में संशोधन करके उसके कुछ प्रावधानों को हटाना ही पड़ेगा। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो सु्प्रीम कोर्ट हर बार टांग अड़ायेगा। और समाज के बंचित हमेशा बंचित ही रह जायेंगे। इसलिए नेहरू ने 1951 में पहला संविधान संशोधन लाया। संविधान का पहला संशोधन किसके लिये किया गया ? दलितों के लिये , आज जो नेहरू को गाली दे रहे है कि क्या किया ? संशोधन प्रस्ताव पर बहस का जबाब देते हुए बाबासाहेब डॉ आंबेडकर ने कहा था उच्चतम न्यायालय ने मद्रास सरकार का जातीय हुक्म रद्द किया। जो बड़ी असंतोषजनक घटना है। और वह संविधान के अनुच्छेद के अनुसार कार्यान्वित नहीं हुई है। उसे मूल अधिकारों के साथ अनुच्छेद 46 का भी ध्यान रखना चाहिए था। मद्रास सरकार ने अनुच्छेद 46 के अनुपालन में ही सामुदायिक आरक्षण का आदेश जारी किया है। अनुच्छेद 46 ने कमजोर वर्ग का कल्याण करने का आदेश सरकार को दिया है। मगर उच्चतम न्यायालय ने यह कहा है कि मौलिक अधिकारों और निति निर्देशक तत्वों में टकराव होगा तो मूल अधिकार ही प्रभावी माना जायेगा। ऐसी स्थिति में अगर अनुच्छेद 46 को सफल बनाना है तो अनुच्छेद 15 ,29 में संशोधन करना होगा। इस तरह अनु 15 में उप क्लाज (4) जोड़ा। 31 में उप क्लाज (क) जोड़ा और 31(ख) जोड़ा। 31(ख) में नवीं अनुसूची बनाईं गई। उसमें लिखवा दिया गया कि अगर नवीं अनुसूची में डाला गया कोई प्रावधान मूल अधिकारों का हनन भी करता है तो उसे किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। संपत्ति के मूल अधिकार वाले अनुच्छेद 31 को हटा न सके क्योंकि पटेल, गोविंद बल्लभ पंत और राजेंद्र प्रसाद के दबाव में उसे मूल अधिकार में डाला गया था। आज संपत्ति का अधिकार मूल अधिकार नहीं है। वह एक कानूनी अधिकार बनाकर जनता पार्टी की सरकार द्वारा 1978 में 44वें संशोधन के माध्यम से 300 (क) में डाल दिया गया है। इस तरह से नेहरू ने संविधान में संशोधन कर भूमि सुधार ऐक्ट 1951 पारित कराया जिसके द्वारा जमींदारी उन्मूलन कर बहुत से भूमिहीनों को भूमि का मालिक बनाया। पहले ये भूमिहीन जमींदारों की जमीन में बसे थे। आज वे अपनी जमीन में बसे हैं। इससे जमींदार नाराज हुए। बड़े बड़े किसान जो 100 बीघा से लेकर 500 सौ बीघा,1000 बीघा के काश्तकार थे,वे नाराज हुए। बहुत से प्रांतों ने इनकी नाराजगी के भय से अपने प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन नहीं किया। जैसे बिहार। राजा जी राजगोपालाचारी ने तो नेहरू की नीतियों से नाराज होकर 1959 में राजाओं नवाबों और जमींदारों की एक अलग राजनीतिक पार्टी ही बना ली थी। जिसका नाम स्वतंत्र पार्टी था। 1962 में चुनाव भी लड़ा था। जिसमें इनको 18 सीटों पर जीत हासिल हुई। इंदिरा जी ने कोयला खादानों और बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर उनके कर्मचारियों को सरकारी नौकर बनाया। इससे खादानों के मालिक और बैंकों के मालिक नाराज हुए। राजाओं और नवाबों का प्रिवी पर्स कानून बनाकर समाप्त किया तो इससे राजा और नवाब नाराज हुए। 1967 में जब गोलकनाथ के वाद में उच्चतम न्यायालय ने सरकार द्वारा अनुच्छेद 46 के अनुपालन में जनता के कल्याण के लिए किए जाने वाले संसद की संविधान संशोधन की शक्तियों पर पाबंदी लगाया तो इंदिरा जी ने 1971 में 24वां संविधान संशोधन कर न्यायालय के निर्णय को ही शून्य कर दिया। 1971 में 25वां संविधान संशोधन कर बैंकों के राष्ट्रीयकरण के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटा। इस संशोधन द्वारा संविधान के अनुच्छेद 31ग में जोड़ा कि इसके तहत बनाये गये नीति को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। 26वां संविधान संशोधन 1971 कर प्रिवी पर्स जजमेंट को पलटा। संघी दलाल नाना पालकीवाला ने इन संशोधनों को संविधान को विकृत एवं अपवित्र करने वाला कहा था। बताइये, जनता के कल्याण के लिए किये गये इन संशोधनों से संविधान विकृत और अपवित्र हो जा रहा है? ऐसी ऐसी मानसिकता के लोग हमारे लिए आदरणीय हैं। 24वें एवं 25वें संशोधन को केशवानंद के वाद में चुनौती दी गयी। इस वाद में 24 अप्रैल 1973 को न्यायालय ने संविधान की उद्देशिका को संविधान का भाग मानते हुए कुछ संविधान के आधारभूत लक्षण तय कर संसद की संविधान संशोधन की शक्तियों पर ही प्रतिबंध लगा दिया। जबकि संविधान में आधारभूत लक्षणों का कोई जिक्र नहीं है। ये आधारभूत लक्षण उच्चतम न्यायालय ने अपने तरफ से जोड़ा। 25वें संविधान संशोधन में 31ग में जोड़े गये संशोधन को असंवैधानिक घोषित किया।

1951 में बाबासाहेब आंबेडकर ने संसद में हिन्दू कोड बिल पर सवालों के जबाब में कहा था,संसद सार्वभौम सत्ता है। वह कानून बना सकती है। और रद्द कर सकती है। इसकेे उलट माननीय सुप्रीम कोर्ट कह रहे हैं कि संसद ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती जो संविधान के आधारभूत ढांचे को रद्द करे।‌ ऐसा लगता है कि इंदिरा जी के संशोधनों से न्यायपालिका भी नाराज थी। 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला,जिसमें इंदिरा जी के संसदीय निर्वाचन को अवैध घोषित किया,उसमें कहीं न कहीं इंदिरा जी के इन संशोधनों की खीझ दिखाई देती है। संसद सर्वोच्च या न्यायपालिका सर्वोच्च। इस निर्णय से न्यायपालिका ने संसद पर अपनी सर्वोच्चता की मुहर लगा दी। केशवानंद के निर्णय को शून्य करने के लिए इंदिरा जी ने 1976 में 42वां संविधान संशोधन किया। 42वें संविधान संशोधन में संविधान के अनुच्छेद 368 में उप क्लाज (4) एवं (5) जोड़ा। 1980 में उच्चतम न्यायालय ने मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ के वाद में 7-6 के बहुमत से इन दोनों संशोधनों को अवैध घोषित कर दिया। 1981 में बावन राव बनाम भारत संघ के वाद में एक और महत्वपूर्ण निर्णय दिया। उसने कहा कि केशवानंद के वाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय दिनांक 24 अप्रैल 1973 के बाद नवीं अनुसूची में डाले गये संविधान संशोधनों की भी समीक्षा सुप्रीम कोर्ट कर सकता है। जबकि संविधान की नवीं सूची में डाले गये अनुच्छेदों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।‌ अब 24 अप्रैल 1973 के उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद से चुनौती दी जा सकती। श्रीमती इंदिरा गांधी मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ के निर्णय को और बावन राव बनाम भारत संघ के वाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को शून्य करना चाहती थीं। पर न कर सकीं और 31 अक्टूबर 1984 को उनकी हत्या हो गई। तब से आज तक किसी कि हिम्मत नहीं हुई कि वह उच्चतम न्यायालय के उस निर्णय को संविधान संशोधन कर पलट सके। आज सुप्रीम कोर्ट संसद से भी ऊपर तब तक है जबतक संसद मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ 1980 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को संविधान संशोधन कर शून्य घोषित नहीं करती या उच्चतम न्यायालय की 13 न्याधीधीशों से बड़ी बेंच इसे खारिज नहीं करती। इस तरह लोगों की नाराजगी से बेपरवाह रहकर दोनों ने गरीब जनता के हित में ढेर सारे काम किये। आज देश की पूरी जनता नेहरू,इंदिरा से नाराज है। उनका नाम लेना भी पसंद नहीं करती। हालांकि दोनों ने बाबासाहेब डाक्टर अंबेडकर को भारत रत्न का सम्मान नहीं दिया। जिसका खामियाजा आज उनको भुगतना पड़ रहा है। जबकि ऐसे ऐसे लोगों को उनके सामाजिक काम के लिए भारत रत्न का सम्मान दिया जो बाबासाहेब डा अम्बेडकर के सामाजिक कार्य के सामने कहीं नहीं ठहरते।

दूसरी तरफ लाख विरोध के बावजूद देशहित समाजहित में नेहरू, गांधी ने बाबासाहेब के आरक्षण प्रस्ताव को माना। उनको भारत के संविधान का शिल्पी बनाया। यह भारत के इतिहास की एक बड़ी घटना है। बाबासाहेब को भारत रत्न का सम्मान क्यों नहीं दिया? यह एक बड़ा प्रश्न है। पर इसको ऐसे समझा जा सकता है। वीपी सिंह ने 52.5% ओबीसी को 27% आरक्षण दिया और बाबासाहेब डाक्टर अंबेडकर को भारत रत्न का सम्मान दिया तो पूरा देश नाराज हो गया। वीपी सिंह देश का कलंक बन गये। इससे पहले जनता की दृष्टि में देश की तकदीर थे। उनकी राजनीति मर गई। यही काम नेहरू और इंदिरा भी करते तो देश का कलंक ही होते। जो हाल वीपी सिंह का हुआ वही हाल इनका भी होता। करने वाले भी एससी-एसटी ओबीसी के ही लोग होते। जैसा वीपी सिंह के साथ किये। आज नेहरू और इंदिरा का राजनीतिक जीवन भी उसी कागार पर है। आखिर इसकी वजह क्या हो सकती है? मेरे समझ में तो बस इतना ही आ रहा है कि देश खुशहाल रहता,जैसा आज मोदी राज में खुशहाल है। यदि नेहरू और इंदिरा जी भी वही करते जो आज मोदी जी कर रहे हैं। लेकिन तब देश कहां रहता? वहीं रहता जहां 75 वर्ष पहले था। देश में जमींदारी प्रथा थी। सब जमींदारों की जमीन में बसे थे। कई गांव ढुंढ़ने पर भी कोई चिट्ठी बांचने वाला नहीं मिलता था। अशिक्षा का आलम ये था। नेहरू ने शिक्षा को आगे बढ़ाया । हाई स्कूल किसी तरह से पास किया नहीं की नौकरी मिल गई। बीए एमए पास करते ही नौकरी मिल जाती थी। आज पीएचडी और एमटेक करने के बाद भी नौकरी नहीं मिल रही है। शिक्षा भी महंगी कर दी गई है। आज उनको नेहरू, इंदिरा का काम दिख नहीं रहा है। देश हर क्षेत्र में कितना प्रगति किया है। मेरी समझ से इसका श्रेय गांधी, नेहरू, अंबेडकर और इंदिरा को ही जाता है। संविधान तो तब भी था। आज भी है। क्या आज संविधान का मतलब कुछ दिख रहा है? इतनी समाज में जागरूकता है। फिर भी कोई कुछ नहीं कर पा रहा है। उस समय तो और भी कुछ नहीं कर पाते। इतनी अशिक्षा थी। बाबासाहेब तो सन् 1956 में दुनिया छोड़कर चले गये। कल्पना करिये जैसे आज मोदी जी संविधान लागू कर रहे हैं वैसे ही नेहरू,इंदिरा भी लागू करते तो क्या होता? कोई एससी-एसटी ओबीसी का नौकरियों में शिक्षा में कहीं दिखाई देता ? नहीं दिखाई देता। मेरा मानना है,अगर किसी ने कुछ उपकार किया है तो उसे मानना चाहिए। किन परिस्थितियों में किया है? कैसे किया? इसका भी संज्ञान लेना चाहिए। हमने कितनी आवाज उठाया। यह भी देखना चाहिए। नेहरू, इंदिरा दोनों ने इस देश के बंचित समाज को आगे बढ़ाने के लिए बहुत कुछ किया। नेहरू, इंदिरा को न मानने वाले और अपने को अंबेडकरवादी कहने वाले बामन मेश्राम जैसे लोग कभी समाजवादी अर्थव्यवस्था का नाम नहीं लेते। बाबासाहेब स्टेट सोसलिज्म चाहते थे ताकि देश में सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य स्थापित किया जा सके। नेहरू इंदिरा दोनों ने कुछ हद तक समाजवादी अर्थव्यवस्था पर चलने का काम किया। पूरी तरह समाजवादी अर्थव्यवस्था पर क्यों नहीं चले? यह सबके लिए जानने का विषय है। पर यदि वो नहीं चले तो वे चल के दिखाएं जो नेहरू इंदिरा का विरोध कर रहे हैं? ओबीसी और दलित नेता सत्ता का जूठन चाटने के लिये जिस तरह मोदी का तलुआ चाटकर विधायक , सांसद बनने के लिये जय श्रीराम का गायन वादन कर रहे हैं , आज बाबा साहब होते तो सुसाईड कर लेते।. ओबीसी आरक्षण को मुद्दा बनाकर कांशीराम साहब की पार्टी यूपी में सत्ता में आई। पांच साल तक पूर्ण बहुमत की सरकार चलाई। अपने को समाजवादी कहने वाले मुलायम ने भी पांच साल तक पूर्ण बहुमत की सरकार चलाई। पर दोनों ने ओबीसी को उनकी आबादी के बराबर 52.5% आरक्षण नहीं दिया। चलो, जवाहरलाल, इंदिरा ने नहीं दिया। आप तो दे देते। यूपी में ही दे देते , कौन रोका था ? कोई सवाल करने वाला नहीं है कि क्यों नहीं दिया? तमिलनाडु सरकार ने अपने राज्य में 69% आरक्षण दे दिया। आपके लिए तो उदाहरण भी था। आज एस सी और ओबीसी दोनों के प्रबुद्ध वर्ग में भगवान परशुराम का भव्य मंदिर बनाने की होड़ मची हुई है। लगता है, इसी से गरीब जनता को भोजन वस्त्र नौकरी जमीन सब मिल जायेगी। दोनों ने सामान्य वर्ग के गरीब लोगों के लिए 10% आरक्षण संविधान में कोई प्रावधान न रहते हुए भी, रातों-रात प्रावधान बनवाकर दिलवा दिया। पर अपना नहीं ले पाये। 52.5% ओबीसी को वीपी सिंह ने सिर्फ 27.5% आरक्षण दिया तो देश में हंगामा हो गया। 10%,के विरोध में कोई हंगामा नहीं हुआ। यही इनकी जागरूकता का पैमाना है। एकाद बार ब्राह्मणों ने इन दोनों की सरकार बनवा दी तो ये समझ रहे हैं कि हर बार बनवा देंगे। ये नहीं समझ रहे हैं कि इनकी वह रणनीति बहुजन मूवमेंट को धराशाई करने के लिए बनाई गई थी। और ये उसमें सफल भी हुए। इनके हर कार्य अपने सामाजिक सम्मान और धन के विशाल भंडार को कायम रखने के लिए ही होते हैं। यह कितनी बड़ी बुद्धिमत्ता का काम है कि उसी का मूवमेंट उसी के अगुआ से चकनाचूर करा दिया। और उसके प्रबुद्ध वर्ग को पता भी नहीं चला। ऐसी मिसालें कम देखने को मिलती हैं।
भाजपा ने ओबीसी के अंतर्गत आने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल की 600 फीट ऊंची प्रतिमा 3643.78 करोड़ की लागत से लगायी। लगाने वाले भी ओबीसी के हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी। भाजपा की दृष्टि में सरदार पटेल में ऐसी क्या खास खूबी थी कि उनकी प्रतिमा के पीछे भारत सरकार का इतना राजस्व खर्च किया? और जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी को कोई तवज्जो नहीं दिया? जबकि दोनों ही उच्च वर्ग से थे और उच्च वर्ग को खुश रखने के लिए ही ओबीसी को आरक्षण नहीं दिया और डाक्टर अंबेडकर को भारत रत्न का सम्मान नहीं दिया। सब यही जानते हैं कि सरदार पटेल जैसी शख्सियत ने पूरे भारत की 527 से भी अधिक रियासतों को भारत में मिलाया।‌ वह भारत की एकता अखंडता के लिए राष्ट्र पुरुष हैं। इसलिए उनकी प्रतिमा लगाई गई है। मैंने बहुत से पिछड़े वर्ग का संगठन चलाने वाले लोगों के भाषणों में सुना है कि जब देश आजाद हुआ तो आजाद भारत का प्रधानमंत्री बनने की होड़ में बहुत से नेता थे। उनमें सरदार बल्लभभाई पटेल,अब्दुल कलाम आजाद, पट्टाभि सीतारमैया, जेबी कृपलानी और जवाहरलाल नेहरू थे। संघियो द्वारा जोर शोर से प्रचारित करते हुये यह भी सुना है कि कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति का एक भी सदस्य पं.जवाहर लाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने के लिए सहमत नहीं था। पटेल के नाम पर सब सहमत थे। उनको पीएम के रूप में देखना चाहते थे। क्योंकि जो कांग्रेस का अध्यक्ष होता वही भारत का भावी प्रधानमंत्री भी होता। मेरे मन में एक सवाल पैदा हुआ कि आखिर क्यों पं.जवाहर लाल नेहरू के पक्ष में एक भी कार्यसमिति का सदस्य नहीं था? जबकि वह ब्राह्मण कुल से थे। देखिये, यहां ब्राह्मणों के लिए जातीय नेता महत्त्वपूर्ण नहीं। सामाजिक हित महत्वपूर्ण है। कांग्रेस कार्यसमिति के 15 में से 12 सदस्य सरदार बल्लभभाई पटेल के पक्ष में थे? जबकि वह कुर्मी ओबीसी समुदाय से थे। क्या पटेल भारत में पूंजीवाद स्थापित करना चाहते थे? इसीलिए कांग्रेस कार्यसमिति के सभी सदस्य पटेल के पक्ष में थे। ताकि उनकी रियासतें उनकी जमींदारी कायम रहे? जवाहरलाल नेहरू समाजवादी व्यवस्था चाहते थे। इससे सबको अपनी जमीन और रियासत जाने का भय था? इसीलिए नेहरू के पक्ष में कार्यसमिति का एक भी सदस्य नहीं था? क्या इसीलिए बीजेपी सरदार पटेल की इतनी ऊंची प्रतिमा खड़ी की है ताकि बीजेपी को उसकी पूंजीवादी व्यवस्था को बल मिले? गांधीजी क्यों पं.जवाहरलाल नेहरू को ही आजाद भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे? क्या पं. नेहरू गांधी के रिश्तेदार थे, जाति के थे , क्या थे? जिनके पक्ष में कार्य समिति का एक भी सदस्य नहीं था। वे पटेल को क्यों नहीं प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे जबकि उनके पक्ष में कार्यसमिति के सारे सदस्य थे? क्या उनको इस बात का अंदेशा था कि उनके पीएम होने से पहली बात देश पूंजीवादी ढर्रे पर चल देगा और दूसरी बात डाक्टर अंबेडकर को संविधान सभा में लाना मुश्किल होगा क्योंकि पटेल नहीं चाहते थे कि अंबेडकर संविधान सभा में आयें। गांधीजी देशहित में बाबा साहेब अंबेडकर को संविधान सभा में लाना आवश्यक समझते थे। अगर पटेल प्रधानमंत्री होते तो क्या डाक्टर अंबेडकर संविधान सभा में जा पाते? संविधान में एससी-एसटी ओबीसी के लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था करा पाते? पिछड़े वर्ग के कुछ लोग कहते हैं कि गांधीजी ने सरदार वल्लभ भाई पटेल को प्रधानमंत्री न बनाकर उनके साथ अन्याय किया। पिछड़े वर्ग के इन लोगों को जान लेना चाहिए कि अगर पटेल प्रधानमंत्री हो गये होते तो जो पूंजीवाद 1991 से और 2014 से प्रारंभ हुआ वह 1950 से ही प्रारंभ हो गया होता और संविधान में न तो पिछड़ा वर्ग होता न आरक्षण होता। मान लिजिए गांधी जी उनको प्रधानमंत्री बना देते तो क्या जवाहरलाल नेहरू उनको प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार कर लेते? नहीं करते तो क्या होता? इस झगड़े में आजादी की बात कुछ और दिन नहीं टल जाती? मान लिजिए कि नेहरू जी मान जाते और सरदार वल्लभ भाई पटेल भारत के प्रधानमंत्री बन जाते तो क्या डा.अंबेडकर को संविधान सभा में आने देते? क्योंकि राष्ट्रीय कार्यसमिति के सारे सदस्य तो उनके साथ थे। यदि नहीं आने देते तो आजाद भारत का स्वरूप कैसा होता? डाक्टर अंबेडकर ने पहले ही कह दिया था कि देश को यह जान लेना चाहिए कि जब देश और अस्पृश्यों के हित आपस में टकरायेंगे तो मैं देश हित के साथ खड़ा न होकर अस्पृश्यों के हित के साथ खड़ा होऊंगा। (धनंजय कीर की किताब पृ.313) ऐसी स्थिति में यदि डाक्टर अंबेडकर की बात न मानी जाती तो देश का एक और विभाजन तय नहीं था? फिर देश की अखंडता के लिए पटेल द्वारा 527 रियासतों के एकीकरण का क्या मतलब होता यदि पटेल की ही वजह से देश का एक और विभाजन हो जाता? एससी के कुछ लोग कहते हैं कि तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारतीय नेताओं को चेतावनी दिया था और कहा था कि जिस संविधान को डा अम्बेडकर नहीं मानेंगे उस संविधान को हम स्वीकार नहीं करेंगे। पर ऐसा कुछ तो कहीं नहीं मिलता। ब्रिटिश हुकूमत ने तो अप्रैल 1946 में ही कह दिया था कि हम अछूतों को भारत की आज़ादी में रोड़ा नहीं बनने देंगे। (धनंजय कीर की किताब,”डाक्टर बाबासाहेब अंबेडकर जीवन चरित” पृ.358) । फिर यह बात कहां से आ गई कि एटली ने कहा था कि हम उसी संविधान को मान्यता देंगे जो अंबेडकर की सहमति से बनकर आयेगा? यह भी देखने वाली बात है कि जो ब्रिटिश हुकूमत 1944 में कह रही थी कि जब हम भारत छोड़कर जायेंगे तो तीन पक्ष होंगे हिन्दू, मुस्लिम और अस्पृश्य। वही सरकार दो वर्ष बाद 1946 में बदल कैसे गई और कह रही है कि हम अछूतों को भारत की आजादी में रोड़ा नहीं बनने देंगे? जब बाबासाहेब डाक्टर अंबेडकर बंगाल से संविधान सभा के लिए चुन लिए गये तो वे अक्टूबर 1946 में ब्रिटेन जाकर एटली और भारत मंत्री दोनों से मिलकर अपनी बात रखी। फिर सैमुअल होर से विचार-विमर्श किया। हुजुर दल की भारत समिति की एक बैठक आयोजित की। उसमें अपना भाषण दिया और अपनी मांग रखा पर सबने उनकी बात को अनसुनी कर दिया। सिर्फ इतनी सलाह दिया कि परिवर्तित परिस्थिति के साथ मिलजुल कर संविधान समिति में कुछ करना हो तो किया जाय। ये बाबासाहेब अंबेडकर के लिए निराशाजनक उत्तर थे। इस तरह निरूत्साहित मन से बाबासाहेब डा अंबेडकर को भारत लौटना पड़ा। (धनंजय कीर की पुस्तक पृ 365)। भारत पाक बंटवारे में वह सदस्यता भी चली गई। कैसे गई? फिर क्या हुआ कि जून 1947 में गांधी जी और जवाहरलाल ने ही आपसी विचार-विमर्श के बाद कांग्रेस के सभी श्रेष्ठ नेताओं जैसे पटेल, डाक्टर राजेंद्र प्रसाद, आदि को विश्वास में लेकर बाबासाहेब डाक्टर अंबेडकर को संविधान सभा में लाने का प्रबंध किया और लाया,उनके आरक्षण संबंधी प्रस्ताव को माना। उन्हें संविधान की प्रारूप कमेटी का चेयरमैन बनाया। और भारत का प्रथम कानून मंत्री बनाया। यह एक प्रश्न तो है ही कि आखिर कांग्रेस के इन नेताओं के सामने कौन सी ऐसी मजबूरी आ गयी कि उनके न चाहते हुए भी और ब्रिटिश हुकूमत का दबाव न होते हुए भी बाबा साहब डाक्टर अंबेडकर को संविधान सभा में लाना पड़ा। उन्हें संविधान का शिल्पी बनाना पड़ा। आज भी उच्च वर्ग द्वारा आरक्षण का विरोध हो रहा है और डाक्टर अंबेडकर की मूर्तियां तोड़ी जा रही हैं। लेकिन क्यों गांधी जी ने अपने धुर विरोधी डाक्टर अंबेडकर को संविधान सभा में लाने के लिए नेहरू को अपनी स्वीकृति दिया? क्यों उनकी शर्तों को मानने के लिए कहा? जबकि वे खुद भी आरक्षण के विरोधी थे। ब्रिटिश हुकूमत ने भी डाक्टर अंबेडकर की मांग पर निराशाजनक ही रूख अख्तियार किया था। उनका भी दबाव नहीं था। क्या यह जानने समझने का विषय नहीं है कि गांधी जी और जवाहरलाल कैसे इतनी जल्दी बदल गये और पूरी कांग्रेस कार्यसमिति डाक्टर बाबासाहेब आंबेडकर को संविधान सभा में लाने के लिए सहमत हो गयी? संविधान को सर्वसम्मति से पारित किया। संविधान सभा का डिबेट पढ़ने से भी पता चलता है कि कांग्रेस के अधिकांश सदस्य आरक्षण को संविधान में नहीं रखना चाहते थे। उदाहरण के लिए श्री पी सीतारमैया का कथन कोट किया जा सकता है। यह भी प्रधानमंत्री की पंक्ति में खड़े थे। उनका कथन था अंत में हमें एकाएक इस संविधान सभा को अनेक वर्गों और समूहों के साथ अपनाना पड़ा। बहुत मूल्य चुका कर हमने इन वर्गों और समूहों से पीछा छुड़ाया था। (संविधान सभा का डिबेट पृ..4171)।
इस लेख में मैंने ढेर सारे सवाल किये हैं जिनके उत्तर अगली पोस्ट में जानने का प्रयास करेंगे। पर मेरे इस तरह की पोस्ट लिखने की वजह क्या है? वजह यह है कि जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने अपने शासनकाल में उच्च वर्ग के साथ समायोजन करते हुए एससी-एसटी ओबीसी का बहुत कुछ विकास किया। इसमें कोई दो राय नहीं। पर पिछड़े समाज को पता नहीं हो पा रहा है कि कैसे तमाम विरोधों का सामना करते हुए नेहरू और इंदिरा गांधी ने कमजोर वर्ग का इतना विकास किया। किनके दबाव में नेहरू और इंदिरा गांधी ने ओबीसी को आरक्षण नहीं दिया। डाक्टर अंबेडकर को भारत रत्न का सम्मान नहीं दिया। यह कब तक पता चलेगा और कब तक उनके दबाव में सरकारें चलती रहेंगी? कब तक कट्टरपंथी उच्च वर्ग की विचारधारा में परिवर्तन आयेगा और कैसे आयेगा? क्या सभी राजनीतिक पार्टियां इसी कट्टरपंथी उच्च वर्ग के दबाव में काम करती रहेंगी या कभी पिछड़े वर्ग के दबाव में भी काम करेंगी? वह समय कब आयेगा? पिछड़े वर्ग के प्रबुद्ध वर्ग से यह मेरा सवाल है। भारत का इतिहास इस बात का गवाह है कि कट्टरपंथी उच्च वर्ग कभी किसी नेता या राजा का पिछलग्गू नहीं रहा। सबको अपने पीछे चलाता रहा। कट्टरपंथी उच्च वर्ग को विश्वास में लेकर ही कोई शासक शासन कर सका। नेहरू इंदिरा ने भी यही किया। मेरा प्रश्न सिर्फ इतना है कि कब तक पिछड़ा वर्ग का प्रबुद्ध अपने जातीय नेताओं के पीछे चलता रहेगा। उनकी चमचागिरी करता रहेगा। एक लाइन में कहें तो पिछड़े वर्ग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश का शासक कोई भी हो उसे अब पिछड़े वर्ग के दबाव में काम करना होगा। अन्यथा वह शासक नहीं रह पायेगा। तभी उच्च वर्ग की भी विचारधारा बदलेगी और देश तरक्की पर जायेगा। मैं क्यों बार बार पिछड़ा वर्ग इस्तेमाल कर रहा हूं। गरीब शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं। क्योंकि गरीब शब्द का इस्तेमाल करने में भी जाति दीवार बनकर खड़ी हो जाती है। एक होने नहीं देती। गरीब कहने से लोगों को सारे गरीब उच्च वर्ग में ही दिखाई देंगे। पिछड़े वर्ग में एक भी गरीब नहीं दिखेगा। पूंजीपति चाहे उच्च वर्ग का हो या पिछड़े वर्ग का, सबकी सोच एक है पूंजीवाद। उनमें जाति बीच में दीवार नहीं बनती। इससे स्पष्ट दिखाई देता है कि उच्च वर्ग का प्रबुद्ध अपने सामाजिक हित के प्रति कितना सचेत है और पिछड़े वर्ग का प्रबुद्ध अपने समाज के हित के प्रति कितना अचेत है।

(सनेही लाल)

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Mahender Kumar
Author: Mahender Kumar

Journalist

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